
Bharat Varta Desk: एक ट्रक ड्राइवर को अवैध तरीके से 35 दिनों तक कस्टडी में रखने के मामले में नाराज देश की सर्वोच्च अदालत ने बिहार की स्थिति की पोल खोल दी है। सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लगता है बिहार में पूरी तरह पुलिस राज्य है। कोर्ट ने पीड़ित ट्रक ड्राइवर को 5 लाख रुपये मुआवजा देने के पटना हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ बिहार सरकार की अपील याचिका को एक सिरे से खारिज कर दिया। छपरा जिले के परसा थाने में उत्तर प्रदेश के एक मिल्क टैंकर ड्राइवर को 35 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। यह घटना अप्रैल की है। आवेदक ने ईमेल के जरिए पटना हाईकोर्ट को इसकी शिकायत भेजी थी जिस पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने बिहार सरकार को निर्देश दिया था कि ट्रक ड्राइवर को ₹500000 मुआवजा का भुगतान करे। इस फैसले के खिलाफ बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट में चली गई और अपील किया कि दोषी थानेदार को सस्पेंड कर दिया गया है मगर मुआवजे की इतनी राशि देना संभव नहीं है। लेकिन जस्टिस चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने बिहार सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि उसे इस मामले को लेकर कोर्ट में नहीं आना चाहिए।
कोर्ट ने बिहार सरकार को लताड़ा-क्या किसी रसूखदार का मामला होता तब भी अपील करते ?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप का तर्क यह है कि ड्राइवर की कस्टडी के मामले में 5 लाख रुपये का मुआवजा ज्यादा है? सर्वोच्च अदालत ने कहा कि किसी भी शख्स की लिबर्टी छीने जाने के मामले में आप इस तरह से डील करेंगे कि अगर वह शख्स अमीर और रसूखदार होता तो ज्यादा मुआवजा बनता? देश की सर्वोच्च अदालत ने सरकारी पक्ष के वकील को दो टूक समझाया कि जहां तक किसी के लिबर्टी छीने जाने पर मुआवजा का सवाल है तो यदि कोई आदमी गरीब है तब भी वह अमीर और रसूखदार के बराबर है। इसीलिए ट्रक ड्राइवर को ₹500000 मुआवजा देने का हाईकोर्ट का फैसला बिल्कुल सही है।
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