
Bharat Varta Desk: बिहार के पुलिस महानिदेशक (सिविल डिफेंस) अरविंद पांडेय ने बताया है कि लोग झूठे मुकदमों से कैसे बच सकते हैं? उन्होंने अपने विचार को सोशल मीडिया पर साझा किया है। एसपी से लेकर डीआईजी, आई जी और एडीजी कमजोर वर्ग के कार्यकाल के दौरान अरविंद पांडेय मुकदमा विरोधी अभियान चलाने के लिए जाने जाते हैं।
जन समितियां बनाकर मुकदमों की परेशानी से लोगों को बचाया
अरविंद पांडेय ने कई जिलों में ग्राम स्वराज और जनता की दूसरी समितियां बनवाई जो लोगों के आपसी विवादों का निपटारा सामाजिक स्तर पर ही कर देती थीं। इससे लोग थाना और कोर्ट में केस -मुकदमों की परेशानी से बच जाते थे। मुजफ्फरपुर और गया में डीआईजी रहते उन्होंने “केस मुकदमा नहीं करेंगे भाई- भाई बन कर रहेंगे” का विशेष अभियान चलाया जो बहुत चर्चित हुआ था। इस दौरान उन्होंने 30- 40 साल से केस लड़ रहे लोगों के बीच सुलह करवाया और मुकदमा खत्म करवाया। जिलों और रेंज में काम करते हुए अरविंद पांडे ने लोगों को झूठे मुकदमे में फंसाने वाले कई पुलिस अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई भी की। वे जहां भी पदस्थापित हुए इस नियम का पालन करवाया कि किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी तय प्रक्रिया के पालन के बाद दोष साबित होने पर ही हो।
कैसे दर्ज होता है केस
अरविंद पांडे ने सोशल मीडिया पर कहा है कि पुलिस 99% मामलों में स्वयं मुकदमा दर्ज नहीं करती। थाना में मुकदमा दर्ज होने के लिए एक शिकायतकर्ता आवश्यक होता है जो थाना में लिखकर देता है कि अमुक अमुक व्यक्ति ने ये अपराध किया है। अब जिन व्यक्तियों के विरुद्ध अपराध का आरोप होता है वे अभियुक्त बन जाते हैं।
डीएसपी और एसपी की सहमति के बाद ही गिरफ्तारी का नियम
पुलिस अनुसंधान की प्रक्रिया में पहले मुकदमा दर्ज होता है फिर उसका पर्यवेक्षण पुलिस उपाधीक्षक द्वारा किया जाता है जब पर्यवेक्षण में उपाधीक्षक, अभियुक्तों के विरुद्ध साक्ष्य होने की पुष्टि करते हैं तब वे अपनी पर्यवेक्षण टिप्पणी जिले के पुलिस अधीक्षक के समक्ष भेजते हैं। अब जिला पुलिस अधीक्षक द्वारा उपाधीक्षक की पर्यवेक्षण टिप्पणी की समीक्षा की जाती है और यदि वे सहमत होते हैं तब अभियुक्तों के विरुद्ध गिरफ्तारी का आदेश देते हैं। अर्थात किसी मुकदमें में गिरफ्तारी के लिए उपाधीक्षक और पुलिस अधीक्षक की सहमति आवश्यक होती है केवल थानाध्यक्ष या अन्वेषक ही अधिकृत नहीं होते।
झूठा मुकदमा दायर हो जाने पर क्या करें?
अरविंद पांडेय बताते हैं को जब भी किसी व्यक्ति को लगे कि उसके विरुद्ध झूठा मुकदमा किया गया है तब उसे तुरंत अपनी निर्दोषिता साबित करते हुए एक आवेदन मुकदमें के 1. अनुसंधानकर्ता, 2.थानाध्यक्ष, 3. उस क्षेत्र के पुलिस उपाधीक्षक और 4. जिला पुलिस अधीक्षक को तुरंत देना चाहि। आजकल सभी के पास whatsapp और ईमेल की भी सुविधा है…आप इन माध्यमों से प्रतिदिन कई बार अपना आवेदन भेज सकते हैं।
यदि चाहें तो सभी वरीय पुलिस अधिकारियों को यह आवेदन दे सकते हैं।
नहीं कराएं पैरवी
डीजी सिविल डिफेंस अरविंद पांडेय ने यह भी सलाह दी है कि ऐसे मामलों में दूसरों से पैरवी नहीं कराएं अन्यथा अधिकारियों को आपकी निर्दोषिता पर संदेह हो सकता है।
यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोई भी व्यक्ति बिना कारण झूठा मुकदमा भी किसी के विरुद्ध नहीं करता। कोई न कोई कारण अवश्य होता ….इसलिए, झूठे मुकदमें से पीड़ित व्यक्ति को उस कारण का पताकर उसका भी समाधान करना चाहिए।
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