‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय’, रेल अधिकारी दिलीप कुमार का कॉलम

अप्प दीपो भव-37
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दिलीप कुमार
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जिस संसार में हम रहते हैं वह कर्म प्रधान है। जो मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है। अपवादों की कमी नहीं है । फिर भी साधारणतया अच्छा कर्म करने वाले लोगों को अच्छा फल प्राप्त होता है जबकि बुरा कर्म करने वाले लोगों को बुरा फल मिलता है। कर्म के फल से बचना कठिन है। सुख का संबंध हमारे अच्छे कर्मों से हैं जबकि दुख का संबंध हमारे बुरे कर्मों से। अज्ञानतावश भी यदि हम बुरे कर्म करते हैं तो उसका गलत नतीजा निकल सकता है। जानबूझकर बार-बार गलत कर्म किए जाएं तो अल्पकाल में हमें लाभ मिलता दिख सकता है, लेकिन दीर्घकाल में उससे नुकसान ही होता है।
संतो और कवियों ने बार-बार अलग-अलग तरीके से कर्मफल को समझाया है। एक दोहे में संत कवि तुलसीदास करते हैं-
तुलसी काया खेत है, मनसा भयौ किसान
पाप पुण्य दोउ बीज हैं, बुवै सौ लुनै निदान ।।

यानी हमारा शरीर एक खेत है और मन किसान है। मन के पास पाप और पुण्य रूपी दो बीजों में से एक को लगाने का विकल्प रहता है। मन खेत में जिस प्रकार का बीज बोता है, उसी प्रकार की फसल प्राप्त होती है। खेत में यदि पाप रूपी बीज का रोपण किया जाए, तो पाप का पौधा ही बड़ा होगा और उसमें पाप रूपी फल ही लगेंगे। यदि खेत में अच्छे कर्मों के बीज लगाए जाएंगे, तो पौधे से शुभ फल की प्राप्ति होगी।
कबीर दास ने भी बहुत सहज ढंग से इसी बात को समझाया है-
करता था तो क्यों रहा, अब काहे पछताय
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय ।
हम में से बहुत सारे लोग कर्म के समय ध्यान नहीं देते और जीवन में लापरवाही करते रहते हैं। आलस्य और अहंकार के कारण जब हम अपने जीवन में बबूल के गाछ रोपते हैं, तो हमें बदले में बबूल के फल ही प्राप्त होंगे। यदि हम आम पाने की प्रत्याशा रखते हैं, तो बीजारोपण के समय ही इस बात का ध्यान रखना होगा कि बरसात के समय आम की गुठली उपजाऊ जमीन में लगाई जाए जो बाद में बड़ा होकर आम का पेड़ बने। आम के पेड़ से आम और बबूल के पेड़ से बबूल मिलते हैं। बबूल के पौधे लगाकर जीवन में आम पाने की उम्मीद करना बेवकूफी है। कबीर जैसे सद्गुरु हमें इस प्रकार की गलत उम्मीद से प्राप्त होने वाली निराशा से बचाना चाहते हैं। इसीलिए वह कहते हैं कि बुरे कर्म करो ही नहीं। आम का फल नहीं भी खाना चाहो, तब भी आम के पेड़ ही लगाओ। यदि दूसरे लोग तुम्हारी बुराई करना चाहते हैं, तब भी तुम उनकी भलाई के बारे में ही सोचो।
जो तोको कांँटा बुवे, ताहि बोय तू फूल ।
तोको फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ।।
यदि कोई दूसरा व्यक्ति हमारे लिए कांटा लगा रहा है, तो उसकी परवाह हमें नहीं करनी है। हमें अपने कर्म पर ध्यान देना है। हमें फूल लगाते हुए जीवन जीना है। जो लोग कांटा लगाते हैं उनकी दुनिया कांटे की होती है। उनके दुष्कर्म उनकी जिंदगी को तबाह करते हैं। उन्हें दिन में बेचैनी मिलती है और रातों को उनकी नींद हराम होती है। बुरे कर्म का नतीजा बुरा होता है। जो लोग फूल लगाते हैं उनके जीवन में खुशबू फैली होती है। फूल लगाने वालों का जीवन सतरंगी होता है। जीवन के फूलों से अपनी भलाई तो होती ही हैं, पूरा वातावरण भी सुगंधित होता है। इससे चारों और सकारात्मक ऊर्जा फैलती है। हमारे अच्छे कर्मों के सम्मोहन में आकर हमारे शत्रु भी मित्र बन जाते हैं।
कांँटों के पौधे तेजी से बढ़ते हैं। काँटों के पौधों का आकार अपेक्षाकृत छोटा होता है। उनका नाश भी जल्दी ही होता है। बरगद, पीपल और आम जैसे पेड़ों को बड़ा होने में समय लगता है। ये पेड़ दीर्घजीवी होते हैं। इनकी उपस्थिति मात्र से जग का कल्याण होता है। इनके होने से प्रकृति में हरीतिमा बढ़ती है और वायुमंडल में ऑक्सीजन। सभी इनके बड़प्पन का गुणगान करते हैं। ये पेड़ अच्छे कर्मों के प्रतिनिधि हैं। बबूल बुरे कर्मों का प्रतिनिधि है। बबूल की टहनी में भी औषधीय गुण होते हैं। फिर भी कांटो की उपस्थिति के कारण समाज में उसे वह सम्मान प्राप्त नहीं होता है, जो बरगद,पीपल और आम जैसे पेड़ों को प्राप्त होता है।

(कवि, लेखक और मोटिवेशनल गुरु दिलीप कुमार भारतीय रेल यातायात सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं।)

Ravindra Nath Tiwari

तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय। 17 साल हिंदुस्तान अखबार के साथ पत्रकारिता के बाद अब 'भारत वार्ता' में प्रधान संपादक।

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