शख्सियत

ऐसे थे ‘नेताजी’ : मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक सफरनामा

मुलायम सिंह यादव राजनीति में दोस्ती की मिसाल थे /रहेंगे ! उन्होंने धुर विरोधियों को भी गले लगाया। कल्याण सिंह, दर्शन सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव भी शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े के माहिर पहलवान माने जाने वाले समाजवादी पार्टी (सपा) संस्थापक मुलायम सिंह यादव कई बार मौत को मात देने के बाद विधि के विधान के हाथों आखिरकार जिंदगी की आखिरी जंग में दुनिया से रुखसत हो गए। अपनी युवावस्था में पहलवान रहे 82 वर्षीय यादव का गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। उत्तर प्रदेश के इटावा स्थित सैफई में 22 नवंबर 1939 को जन्मे यादव का कुनबा देश के सबसे प्रमुख राजनीतिक खानदानों में गिना जाता है। मुलायम सिंह यादव 10 बार विधायक और सात बार सांसद रहे। वह वर्ष 1989, 1991, 1993 और 2003 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और 1996 से 98 तक देश के रक्षा मंत्री भी रहे। एक वक्त वह देश के प्रधानमंत्री पद के दावेदार भी माने गए थे। यादव कई दशकों तक एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर स्थापित रहे लेकिन उनका सियासी अखाड़ा मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश ही रहा। यहीं से उनकी राजनीति निखरी और समाजवाद के प्रणेता राम मनोहर लोहिया से प्रभावित होकर उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करते हुए उत्तर प्रदेश में सत्ता के शीर्ष को छुआ।

समाजवादी पार्टी को शिखर पर पहुंचाने के बाद वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा को पूर्ण बहुमत मिलने पर यादव ने अपनी गद्दी अपने बेटे अखिलेश यादव को सौंप दी। जनवरी 2017 में अखिलेश के सपा अध्यक्ष पद पर काबिज होने के बावजूद मुलायम की सपा में हैसियत ‘नेताजी’ के रूप में बनी रही। यादव ने अपने राजनीतिक सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे। हर सफलता और विफलता में वह सपा कार्यकर्ताओं के नेताजी के तौर पर स्थापित रहे। वर्ष 2016 में अखिलेश और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव के बीच तल्खी से उत्पन्न बगावत के बाद भी मुलायम सिंह यादव ही वह शख्सियत रहे जिनकी मौजूदगी परिवार की एकजुटता की आस जगाती थी। मुलायम सिंह ने राजनीति की सभी संभावनाओं की थाह ली थी। वह अलग-अलग दौर में लोहिया की संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल, भारतीय लोक दल और समाजवादी जनता पार्टी से भी जुड़े रहे। उन्होंने वर्ष 1992 में समाजवादी पार्टी का गठन किया और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन कर सफलतापूर्वक चुनाव लड़ा। इसके अलावा, उन्होंने राज्य में अपनी सरकार बनाने या बचाने के लिए कांग्रेस और परोक्ष रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का भी साथ लिया।

वर्ष 2019 में यादव ने संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना भी की और उन्हें उसी वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में दोबारा जीत का आशीर्वाद भी दिया। उस वक्त उत्तर प्रदेश में भाजपा को सपा की मुख्य प्रतिद्वंदी पार्टी के तौर पर देखा जा रहा था। ऐसे में यादव के इस बयान पर कई अटकलें लगाई गईं। मुलायम सिंह यादव ने भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश का परिसंघ बनाने की वकालत भी की। अपने छात्र जीवन में छात्र संघ की राजनीति में सक्रिय रहे मुलायम सिंह यादव ने राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल करने के बाद एक इंटर कॉलेज में कुछ समय के लिए शिक्षण कार्य भी किया। वह वर्ष 1967 में जसवंत नगर सीट से पहली बार विधायक बने। अगले चुनाव में वह फिर इसी सीट से विधायक चुने गए। बेहद जुझारू नेता माने जाने वाले मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 1975 में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार द्वारा देश में आपातकाल घोषित किए जाने का कड़ा विरोध किया। आपातकाल खत्म होने के बाद वह लोकदल की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष बने। सियासत की नब्ज को टटोलने का बेमिसाल माद्दा रखने वाले यादव वर्ष 1982 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के लिए चुने गए और और इस दौरान वह वर्ष 1985 तक उच्च सदन में विपक्ष के नेता भी रहे। वह वर्ष 1989 में पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। इसी दौरान राम जन्मभूमि आंदोलन ने तेजी पकड़ी और देश-प्रदेश की राजनीति इस मुद्दे पर केंद्रित हो गई। अयोध्या में कारसेवकों का जमावड़ा लग गया और उग्र कारसेवकों से बाबरी मस्जिद को ‘बचाने’ के लिए 30 अक्टूबर 1990 को कारसेवकों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं, जिसमें पांच कारसेवकों की मौत हो गई। इस घटना के बाद प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भाजपा तथा अन्य हिंदूवादी संगठनों के निशाने पर आ गए और उन्हें ‘मुल्ला मुलायम’ तक कहा गया। मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 1992 में सपा का गठन किया। बाबरी मस्जिद को बचाने के लिए कारसेवकों पर कड़ी कार्रवाई के बाद मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग सपा के साथ जुड़ गया, जिससे पार्टी के लिए ‘मुस्लिम-यादव’ का चुनाव जिताऊ समीकरण उभर कर सामने आया। इससे सपा राजनीतिक रूप से बेहद मजबूत हो गई। उत्तर प्रदेश की सियासत के इस पहलवान ने उसके बाद एक लंबे अरसे तक भाजपा और अन्य विरोधी दलों को मजबूत नहीं होने दिया। नवंबर 1993 में मुलायम सिंह यादव बसपा के समर्थन से एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने, लेकिन बाद में समर्थन वापस होने से उनकी सरकार गिर गई। उसके बाद यादव ने राष्ट्रीय राजनीति का रुख किया और 1996 में मैनपुरी से लोकसभा चुनाव जीते। विपक्षी दलों द्वारा कांग्रेस का गैर भाजपाई विकल्प तैयार करने की कोशिशों के दौरान मुलायम कुछ वक्त के लिए प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर भी नजर आए। हालांकि, वह एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व में बनी यूनाइटेड फ्रंट की सरकार में रक्षा मंत्री बनाए गए। रूस के साथ सुखोई लड़ाकू विमान का सौदा भी उन्हीं के कार्यकाल में हुआ था। बाद में मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की राजनीति का रुख किया और वर्ष 2003 में तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। 2007 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद बसपा की सरकार बनने पर वह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे।

वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा को पहली बार पूर्ण बहुमत मिला। उस वक्त भी मुलायम सिंह यादव के ही मुख्यमंत्री बनने की पूरी संभावना थी, लेकिन उन्होंने अपने बड़े बेटे अखिलेश यादव को यह जिम्मेदारी सौंपी और अखिलेश 38 वर्ष की उम्र में राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। हालांकि, वर्ष 2016 में यादव परिवार में बिखराव शुरू हो गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव के बीच वर्चस्व की जंग शुरू हो गई, जिसकी वजह से शिवपाल ने वर्ष 2018 में प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के नाम से अपना अलग दल बना लिया। मुलायम इस दौरान अपने कुनबे को एकजुट करने की भरपूर कोशिश करते रहे, लेकिन इस बार उन्हें लगभग मायूसी ही हाथ लगी। इस साल के शुरू में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश और शिवपाल यादव एक बार फिर साथ आए। इसका श्रेय भी मुलायम सिंह यादव को ही दिया गया। हालांकि, चुनाव में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली जिसके बाद शिवपाल और अखिलेश के रास्ते एक बार फिर अलग-अलग हो गए। जिंदगी के आखिरी दिनों में मुलायम सिंह यादव स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं से घिर गए और 10 अक्टूबर 2022 को गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली। मुलायम जब तक जीवित रहे वह सपा कार्यकर्ताओं के ‘नेताजी’ बने रहे।

Dr Rishikesh

Editor - Bharat Varta (National Monthly Magazine & Web Media Network)

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