
सुपौल से सुनील कुमार गुड्डू
सरकार वोकल फ़ॉर लोकल को लेकर बड़ी बड़ी बातें करती है पर जमीनी स्तर पर परम्परागत रूप से बृहद पैमाने पर होने वाले चटाई निर्माण का कार्य आज भी इससे अछूता है। सुपौल जिले के चार प्रखंडों में लोग कोसी के मरुभूमि पर आप रूपी उगने वाले पटेर से सुंदर और स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से उपयोगी चटाई बनाकर परिवार का भरण पोषण करते हैं। चटाई को मेडिकल साइंस भी उपयोगी मानता है। सुपौल के ग्रामीण काफी मेहनत करके चटाई बनाते तो हैं पर उसे समुचित बाजार नहीं मिल पाता है। जिसके चलते आज सैकड़ों साल वाद भी इसे उद्योग का दर्जा नहीं मिल पाया है।
घाटे का सौदा बन गया चटाई बनाना
उद्योग धंधे में शामिल चटाई निर्माण अब कामगारों के लिये घाटे का सौदा साबित हो रहा है। सदियों से चली आ रही इस चटाई उद्योग परंपरा को सहेज कर रख रहे लोग अब धंधे से विमुख हो रहे है। यही कारण है कि विरासत में मिले हुनर को खत्म होते देख धंधे में शामिल लोग काफी दुखी है। जिले के पिपरा प्रखंड अंतर्गत भैया रामचकला गांव की अधिकांश आबादी विरासत में मिले चटाई बनाने के का में शामिल है। यहां हर घर के लोग पटेर घास से चटाई निर्माण करते आ रहे हैं। अमूमन चटाई खुले बाजार में एक सौ रुपये से लेकर सवा सौ रुपये तक बिकती है।
कोरोनावायरस का ग्रहण ग्रहण
लेकिन पिछले दिनों कोरोना को लेकर हुई लॉक डाउन की वजह से भारत नेपाल सीमा बंद होने से पटेर घास की उपलब्धता नही होने के कारण चटाई उद्योग पर बंदी के बादल मंडराने लगे हैं। धंधे में शामिल लोगों ने बताया की भारत नेपाल बॉर्डर बंद होने से पटेर की उपलब्धता नही हो रही है। जिससे धंधे पर व्यापक असर पड़ गया है। वही एकमात्र जीविका के साधन का जरिया बने चटाई निर्माण से इन लोगों की घर गृहस्थी चलना मुश्किल होने लगा है। वोकल फ़ॉर लोकल की चर्चा करते स्थानीय ग्रामीणों ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसे उद्योग धंधों को बढ़ावा देने की बात तो करते है। लेकिन चटाई की न तो मार्केटिंग हो रही है और न ही आर्थिक सहूलियत मिल रही है। ऐसे में विरासत में मिले धंधे को बंद करना मजबूरी बन गई है। माना जाता है कि पटेर से निर्मित चटाई एक्यूप्रेशर का भी काम करती है। चटाई निर्माण में जुट से बनी डोरी का इस्तेमाल किया जाता है।
:: पटेर को पानी मे भींगा कर बनाई जाती हैहै चटाई-
चटाई बनाने से पहले पटेर को पानी मे भींगा कर उसे नरम बनाया जाता है। उसके बाद लकड़ी से बने सांचे में डोरियों में पिरो कर चटाई बनाई जाती है। गर्मी के दिनों में ग्रामीण इलाके के लोग विस्तर बना कर सोते है। ग्रामीण इलाके में चटाई की बिक्री धड़ल्ले से होती है। लगभग एक चटाई के निर्माण में दो से तीन घंटे का वक्त लगता है। पूरे दिन में तीन से चार चटाई घर की महिला व पुरुष मिलकर बना लेते है। एक चटाई की लागत लगभग सत्तर रुपये आती है चार चटाई की बिक्री होने से दो तीन सौ रुपये की कमाई धंधे में शामिल लोगों को हो जाती है। परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होने से छह से आठ चटाई बन जाती है। चटाई जैसे कुटीर उद्योग में शामिल लोगों ने बताया कि पहले पटेर बॉर्डर से आसानी से आ जाता था अब भपटियाही व कुनौली बॉर्डर से अधिक कीमत पर मंगानी पड़ती है। धंधे में शामिल लोगों के मुताबिक आज के युवा इन धंधों में शामिल नही होना चाहते है।
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