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संथाल हूल से लेकर अटल जी को याद किया द्रौपदी मुर्मू ने, प्रथम आदिवासी महिला राष्ट्रपति की सादगी ने सबको किया प्रभावित


Bharat varta desk: आज ठीक 10 बजे राष्ट्रपति पद का शपथ ग्रहण करने के बाद देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने बड़े ही सहज और सरल ढंग से हिंदी में भाषण दिया। आदिवासियों की परंपरागत हरे रंग की पाढ वाली सफेद साड़ी और सफेद हवाई चप्पल पहनकर शपथ ग्रहण करने आईं राष्ट्रपति की सादगी सबको प्रभावित कर गई। अपने भाषण में उन्होंने संथाल हूल, बिरसा मुंडा से लेकर आजादी की लड़ाई में जनजातीय समाज और महिलाओं की भूमिका को याद किया। उन्होंने आजादी के अमृत महोत्सव की चर्चा की।

भारत का गरीब सपने देख सकता है


उन्होंने कहा कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर मेरा निर्वाचन इस बात का सबूत है कि भारत का गरीब सपने देख सकता है और उसे पूरा भी कर सकता है। उन्होंने कहा कि मैंने अपनी जीवन यात्रा ओडिशा के एक छोटे से आदिवासी गांव से शुरू की थी। मैं जिस पृष्ठभूमि से आती हूं, वहां मेरे लिए प्रारंभिक शिक्षा हासिल करना भी सपने जैसा था लेकिन अनेक बाधाओं के बावजूद मेरा संकल्प दृढ़ रहा और मैं कॉलेज जाने वाली अपने गांव की पहली व्यक्ति थी। राष्ट्रपति के संबोधन के दौरान कई बार संसद का केंद्रीय कक्ष तालियों से गूंजता रहा।
राष्ट्रपति ने कहा कि मैंने देश के युवाओं के उत्साह और आत्मबल को करीब से देखा है। हम सभी के श्रद्धेय अटल जी कहा करते थे कि देश के युवा जब आगे बढ़ते हैं तो वे सिर्फ अपना ही भाग्य नहीं बनाते बल्कि देश का भी भाग्य बनाते हैं। आज हम इसे सच होते देख रहे हैं।

यह मेरी नहीं लोकतंत्र की उपलब्धि

मुर्मू ने कहा कि मैं जनजातीय समाज से हूं और वार्ड काउंसलर से लेकर भारत के राष्ट्रपति बनने तक का अवसर मुझे मिला है। यह लोकतंत्र की जननी भारतवर्ष की महानता है। ये लोकतंत्र की ही शक्ति है कि उसमें एक गरीब घर की आदिवासी बेटी भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंच सकती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के पद तक पहुंचना

कवि भीम भोई की पढ़ी कविता

मैंने अपने अब तक के जीवन में जन-सेवा में ही जीवन की सार्थकता को अनुभव किया है। जगन्नाथ क्षेत्र के एक प्रख्यात कवि भीम भोई जी की कविता की एक पंक्ति है: ‘मो जीवन पछे नर्के पड़ी थाउ, जगत उद्धार हेउ’। यानी अपने जीवन के हित-अहित से बड़ा जगत कल्याण के लिए कार्य करना होता है। मुर्मू ने कहा कि यह मेरे लिए संतोष की बात है जो सदियों से वंचित रहे, विकास के लाभ से दूर रहे, वे गरीब, दलित, पिछड़े तथा आदिवासी मुझमें अपना प्रतिबिंब देख सकते हैं।

Ravindra Nath Tiwari

तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय। 17 साल हिंदुस्तान अखबार के साथ पत्रकारिता के बाद अब 'भारत वार्ता' में प्रधान संपादक।

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