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पूर्व डीजीपी अभयानंद का संदेश – सरकार को सरकार ही रहने दें, उसे समस्त शक्तियों का संचय नहीं मान लें

डॉ सुरेन्द्र की रिपोर्ट।
NEWSNLIVE DESK : राजनीति से खुद को अलग रखने वाले बिहार के पूर्व डीजीपी और सुपर-30 कॉन्सेप्ट के संस्थापक अभयानंद इन दिनों बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान मतदाताओं को जागरूक करने के उद्देश्य से सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म के माध्यम से जागरूकता अभियान चला रहे हैं। बिहार चुनाव के दौरान उनके द्वारा प्रेषित संदेश सोशल मीडिया में खूब शेयर हो रहा है। राजनीति से खुद को अलग रखने की उनकी क्षवि की वजह से लोगों के बीच पूर्व डीजीपी के जागरूकता संदेशों पर विमर्श भी हो रहा।

अब अंतिम चरण के चुनाव के एक दिन पहले अभयानंद ने एक संदेश के माध्यम से कहा है कि “वोट डालने का सिलसिला करीब करीब समाप्त हो गया। सोच रहा हूं हमने ईवीएम में क्या डाला? अपनी शक्ति पांच वर्षों के लिए किसी को दे दी वो भी जो भीख स्वरूप मांगने आया? नहीं, हमने उसे एक दायित्व दिया वो भी मुफ्त का नहीं। अगर कोई बिना कुछ लिए ये कार्य करे तो वो ईश्वर की श्रेणी में आयेगा अन्यथा सभी मनुष्य रहेंगे। मनुष्य को ईश्वर न बनाने दे अन्यथा तकलीफ होगी।”

अभयानंद ने वीलिखा है कि 2020 बिहार का विधान सभा चुनाव अब संपन्न होने के करीब आ गया है। समाज और सरकार के बीच एक नई रेखा खिचेगी जैसा हर चुनाव के बाद अमूमन खिचती है। कुछ लोग जो समाज के अंग रहते हैं, वह सरकार के हो जाते हैं और उल्टा भी होता है।
आम आदमी की ज़िन्दगी में कोई बदलाव जो तुरंत दिखे, वह कभी नहीं दिखता। कुछ जाति समूहों को अकारण ही खुशी का और कुछ को ग़म का एहसास होता है जो बिल्कुल नहीं होना चाहिए। चुनाव को हम बिना कारण के ही आवश्यकता से अधिक महत्व देते हैं। यह एक साधारण संवैधानिक प्रक्रिया है जिसमें कुछ लोगों का चुनाव हम करते हैं और वे अपने कार्यों का निर्वहन करते हैं। न वह हमारे ऊपर कोई एहसान करते हैं न ही हम उनके चुने जाने से अनुगृहित होते हैं। हमें अपनी ज़िन्दगी की समस्याओं से प्रत्येक दिन की जद्दोजहद से स्वयं ही जूझना होगा।
सुझाव होगा कि:

  1. चुनाव के परिणाम के बाद आम आदमी जो व्यवसायिक रूप से पार्टी अथवा पार्टी समूह से जुड़ा हुआ नहीं है वह हर्ष-विषाद को भूलकर, अपनी दिनचर्या में लग जाए। ऐसे भी चुनाव के दौरान लम्बे समय तक सामान्य ज़िन्दगी से आम आदमी दूर हो जाता है। फूल-माला और रंग-गुलाल लगा कर हम एक साधारण प्रक्रिया को असाधारण बना देते हैं जिसे हमें साधारण ही रहने देना चाहिए।
    समाज ने इस प्रक्रिया और फलाफल को बीसों बार देखा है। इसे साधारण ही रहने दें, असाधारण न बनने दें।
  2. समझने की कोशिश करें कि जो भी व्यक्ति और समूह सरकार का अंग बनेगा, वह कोई दिव्य शक्ति से सुशोभित नहीं है और न तो उसमें कोई असीम शक्ति हमने दे दी है कि उसके “जन्म मात्र” से हमारे सभी दुखों का निवारण हो जाएगा और न ही हमें हसरत भरी निगाहों से इस परिणाम की आशा करनी चाहिए।
  3. हमने कोशिश की है कि समाज की समस्याओं को परिभाषित किया जाए और उसे अपने चुने हुए विधायकों के समक्ष रखा जाए। अब हमें विधान सभा में यह विधायक इन समस्याओं को कैसे उठाते हैं, इस पर भी नज़र रखनी होगी। उन्हे हमने वोट दिया है इसलिए उन्हे हमारी आवाज़ बननी होगी। उन्हे समय समय पर समाज के बीच बुलाकर याद दिलाना होगा कि वह मुख्यत: समाज के प्रतिनिधि हैं, न कि पार्टी और सरकार के। समाज को अपनी शक्ति का एहसास निरन्तर दिलाते रहना होगा।
    आशा और निराशा से बचते हुए, अगर हम विवेक से अपने विधायकों के साथ मिल कर अपनी समस्याओं को विधान सभा में रखें तो हितकारी होगा।”
डॉ सुरेंद्र

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