
पटना। बिहार चुनाव में दम आजमाने वाले पार्टियों और उनके प्रत्याशियों के पास मतदान के बाद अपने नेटवर्क से इनपुट पहले ही आ गया था। अब तो एग्जिट पोल का पिटारा भी खुल गया। टेंशन मगर जाने का नाम ही नहीं ले रही। आज की रात कत्ल वाली रात के सामने खड़े होने का अहसास करा रही है। यह रात करवटों में ही कटेगी, यह तय है। काश इस रात की सुबह न होती और 10 नवम्बर को एक झटके में बता दिया जाता कि जीते या कि हारे। रात की कौन कहे यहां तो नेताओं का दिन काटना मुश्किल हो रहा है। धड़कनें इतनी तेज कि पास बैठा शख्स भी सांसों की रफ्तार से सहसा उनका मिजाज भांप ले रहा है।
जिन नतीजों पर अगले पांच साल का सियासी भविष्य दांव पर हो उसका सामना करने से डर तो लगेगा ही, चाहे प्रत्याशी हों या फिर उन सियासी दलों के मुखिया, जिनका दांव पर सबकुछ लगा है। आज इनके दिन का बड़ा हिस्सा तो एग्जिट पोल के नतीजों की जुगाली करते और मतगणना के लिए अपनी-अपनी पलटन को आखिरी वक्त तक के जरूरी निर्देश देते फिर भी कट जाएगी। रात कैसे कटेगी?
चुनाव परिणाम का बेसब्री से इंतजार कर रहे दो प्रमुख गठबंधनों एनडीए और महागठबंधन के नेता तो कुछ इस तरह खौफजदा हैं कि प्रतिद्वंद्वियों के पाले में वोट चले जाने के जोड़-घटाव, गुणा-भाग आदि तमाम गणित पूरी तरह रट कर बैठे हैं।
कहा जा रहा है कि चुनावी नतीजों से ही ये नेता या तो चमकता चांद बनेंगे या फिर एक झटके में ही टूटा हुआ तारा।
अपनी-अपनी जीत की आस लगाए पार्टी नेताओं के समर्थक बस विपक्षी पार्टी की हार की बातें सुनना चाह रहा है। स्ट्रांग रुम में चाक-चौबंद सुरक्षा में रखे गए ईवीएम से अपने खाते में वोट बरसाने की गुहार लगा रहा है। मंदिर-मस्जिद में भी मनौती-दुआ मांगी जा रही है।
खुशफहमी का आलम यह है कि आमने-सामने की टक्कर और त्रिकोणीय मुकाबले वाली सीटों पर भी वे एकतरफा जीत की दुहाई दे रहे हैं। सबका अपना गुणा-भाग। ऐसे में नतीजे आने तक टेंशन कायम रहेगी और दिल की धड़कनें भी बढ़ेंगी। बहरहाल, कल सुबह 8 बजे से ही वोटों की गिनती शुरू हो जाएगी और उसके कुछ घंटों के भीतर यह भी साफ हो जाएगा कि कौन बना सिकंदर और किसे जनता ने नकारा।
टेंशन, धड़कन काफी हद तक कम हो चलेगी। जिसको बहुमत मिलेगा वह शपथ ग्रहण की तैयारी में लग जायेगा। जनता ने किसी को अगर बहुमत न दिया तो आगे की संभावित सियासी जुगलबंदियों की कवायद भी शुरू हो जाएगी। भारत का लोकतंत्र ऐसा ही है, जिसमें इंद्रधनुष सरीखे रंग भरे हैं और उनमें लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव यानी चुनावों का रंग संभवत: सबसे चटख। होली व त्योहार के रंगों से भी गाढ़ा, न्यारा और प्यारा। इसलिए टेंशन वाली कत्ल की रात ढलेगी तो लोकतंत्र के रंगों वाली खुशनुमा सुबह आएगी। इसमें सराबोर होने के लिए तैयार रहिए !
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