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Bharat varta Desk
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए युवाओं से अपील की है कि वे अपने माता-पिता या अभिभावकों द्वारा अवैध या भ्रष्ट साधनों से अर्जित संपत्ति को अस्वीकार करें। उन्होंने कहा कि यदि युवा ऐसी संपत्ति के लाभार्थी बनने से इंकार कर दें, तो यह न केवल सुशासन बल्कि देश के प्रति भी एक बड़ी सेवा होगी।
Live Law की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस नागरत्ना ने कहा —
“देश के युवाओं और बच्चों को अपने माता-पिता या अभिभावकों की ज्ञात आय से अधिक अर्जित संपत्ति को स्वीकार करने के बजाय उसे ठुकरा देना चाहिए। इससे शासन व्यवस्था और राष्ट्र दोनों को लाभ होगा।”
उन्होंने कहा कि लोभ और ईर्ष्या की प्रवृत्ति को मन से हटाना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यही भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की जड़ है। यदि यह मानसिकता नहीं बदली गई, तो भ्रष्टाचार को न तो कम किया जा सकता है और न ही समाप्त किया जा सकता है।
जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए समाज में आध्यात्मिक सोच विकसित करना जरूरी है, जिससे व्यक्ति भौतिक लालच से ऊपर उठकर देश सेवा की भावना को अपनाए।
भ्रष्टाचार संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ
जस्टिस नागरत्ना ने अपने फैसले में कहा कि —
“भ्रष्टाचार, कानून के शासन, संविधान की भावना और सुशासन का शत्रु है। यह देश के लोकतंत्र, विकास की क्षमता, आर्थिक स्थिरता और नागरिकों के आपसी विश्वास को कमजोर करता है।”
उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार का एक भी मामला अनेक लोगों को प्रभावित करता है और इससे नागरिकों का सरकार व संस्थानों पर भरोसा टूटता है, जिससे अच्छे शासन का मार्ग बाधित होता है।
उन्होंने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार समाज में असमानता बढ़ाता है, गरीब और वंचित वर्ग को मिलने वाली सेवाओं को प्रभावित करता है और संस्थानों में लापरवाही व अकुशलता को बढ़ावा देता है।
भ्रष्टाचारियों के प्रति कोई नरमी नहीं
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि भ्रष्टाचार में लिप्त व्यक्तियों के प्रति किसी भी स्तर पर कोई नरमी नहीं दिखाई जा सकती, चाहे अपराध छोटा ही क्यों न हो।
उन्होंने ‘शोभा सुरेश बनाम अपीलीय न्यायाधिकरण’ मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में “रातों-रात अमीर बनने की होड़”, दिखावटी जीवनशैली और भौतिकवाद ने भ्रष्टाचार को एक सामाजिक बीमारी बना दिया है।
पीसी एक्ट की धारा 17A असंवैधानिक
यह टिप्पणी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई।जस्टिस नागरत्ना ने अपने फैसले में कहा कि धारा 17A असंवैधानिक है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए, क्योंकि यह भ्रष्टाचार की जांच में अनावश्यक बाधा पैदा करती है।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की असहमति
हालांकि, पीठ के दूसरे सदस्य न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने इस राय से असहमति जताई। उन्होंने धारा 17A को सही ठहराते हुए कहा कि जांच की अनुमति देने का अधिकार सरकार के बजाय लोकपाल या लोकायुक्त जैसे स्वतंत्र निकाय के पास होना चाहिए।
मामला बड़ी पीठ को भेजा गया
चूंकि दोनों न्यायाधीशों के बीच मतभेद है, इसलिए इस मामले को अब भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा, जो इसे तय करने के लिए एक उचित पीठ गठित करेंगे।
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