
स्टॉकहोम: रसायन विज्ञान में वर्ष 2020 का नोबेल पुरस्कार दो महिला वैज्ञानिकों इमैनुएल चार्पियर और जेनिफर ए डूडना को ‘अनुवांशिकी (जीनोम) में बदलाव करने की विधि खोजने’ के लिए दिया गया है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज, स्टॉकहोम ने इन दोनों महिला वैज्ञानिकों मैक्स प्लैंक यूनिट फॉर द साइंस ऑफ पाथोजेंस बर्लिन (जर्मनी) से जुड़ी इमैनुएल चार्पियर और अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले से जुड़ी जेनिफर ए डूडना का चयन किया है। नोबेल पुरस्कारों से जुड़ी आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक चार्पियर और डूडना ने 2012 में सीआरआईएसपीआर या सीएएस9 आनुवांशिक बदलाव की विधि (जेनेटिक सीजरस) की खोज की थी। आज इसका व्यापक रूप से उपयोग हो रहा है। इसने जीव विज्ञान को एक नए युग में ला खड़ा किया है और कई मायनों में आने वाले समय में इसका मानव जाति को बड़ा लाभ मिलेगा। इस खोज से पहले यह कार्य काफी कठीन और लम्बा होता था लेकिन इन दोनों वैज्ञानिकों की खोज ने इसे सरल और कुछ हफ्तों की प्रक्रिया में बदल दिया। इस तकनीक का उपयोग कर शोधकर्ता जानवरों, पौधों और सूक्ष्मजीवों के डीएनए को अत्यधिक उच्च परिशुद्धता के साथ बदल सकते हैं। इस तकनीक से नए कैंसर उपचार तैयार होंगे और विरासत में मिली बीमारियों को ठीक करने का सपना साकार हो पाएगा। रसायन विज्ञान के लिए नोबेल समिति के अध्यक्ष क्लेस गुस्ताफ्सन कहना है, “इस आनुवंशिक उपकरण में आपार क्षमताएं हैं, जिसका हम सभी के जीवन पर प्रभाव पड़ेगा। इसने न केवल बुनियादी विज्ञान में क्रांति ला दी है, बल्कि नवीन फसलें भी पैदा किए हैं और इससे नए चिकित्सा उपचारों को बढ़ावा मिलेगा।”अबतक रसायन विज्ञान के क्षेत्र में 112 बार पुरस्कार दिए गए हैं। इसमें से 63 इस प्रतिष्ठत पुरस्कार के लिए केवल एक वैज्ञानिक को चुना गया है। वहीं अबतक इस क्षेत्र में सात महिलाओं को पुरस्कार मिल चुका है। हर वर्ष छह क्षेत्रों में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कारों की घोषणा की जाती है। सभी श्रेणियों में 12 अक्टूबर तक नाम घोषित कर दिए जाएंगे। इससे पहले सोमवार को चिकित्सा और मंगलवार को भौतिक शास्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कारों की घोषणा हुई थी। इसके अलावा अब साहित्य, शांति और अर्थशास्त्र में नोबेल की घोषणा होनी बाकी है।नोबेल पुरस्कार जीतने पर 10 मिलियन स्वीडिश क्राउन (1.1 मिलियन डॉलर) का पुरस्कार दिया जाता है। 1901 में पहली बार स्वीडन के वैज्ञानिक अल्फ्रेड बनार्ड नोबेल की याद में इन पुरस्कारों को देने की परंपरा शुरू की गई थी।
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