
NewsNLive Desk: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व विचारक के. एन. गोविंदाचार्य ने कहा है कि केंद्र सरकार ने कुछ महीने पूर्व जो तीन कृषि कानून बनाये, अब तक के अनुभवों के कारण उन कानूनों के बारे में किसानों में भारी आशंका है। किसानों को लग रहा है कि अब तक जो न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारें कृषि उपज खरीद भी रही थीं, वह धीरे धीरे बंद हो जाएगा। उन्हें लग रहा है कि किसानों को सरकारों ने फिर से निष्ठुर बाजार के हवाले करने का निर्णय कर लिया है।
गोविंदाचार्य ने कहा है कि केंद्र सरकार वैसे हर वर्ष विभिन्न कृषि उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। आजकल धान, गेहूं आदि 23 उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित होता है। पर उन 23 में से केंद्र सरकार मुख्य रूप से धान और गेहूं खरीदने की ही व्यवस्था बनायी है और वह भी केवल 4-5 राज्यों में। कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार सरकारें केवल 6% किसानों से ही धान और गेहूं खरीदती है। अर्थात न्यूनतम समर्थन मूल्य तो हर वर्ष घोषित होते हैं, पर केवल 6%किसानों से ही धान और गेहूं खरीदे जाते हैं। बाकी 94% किसानों से धान और गेहूं खरीदे जाने की व्यवस्था सरकारों ने नहीं की है। इसी प्रकार से धान और गेहूं के अलावा अन्य फसलों जैसे दलहन और तिलहन खरीदने की व्यवस्था भी सरकारों ने नहीं की है।
गोविंदाचार्य ने कहा कि 94% किसान धान और गेहूं को और सभी किसान अन्य कृषि उपजों को बाजार में ही बेचने के लिए मजबूर है। केंद्र सरकार हर वर्ष 23 कृषि उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य भले घोषित करती है, पर अधिकांश किसानों को बाजार में वह न्यूनतम मूल्य भी नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए केंद्र सरकार ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य इस वर्ष 1900 रुपये क्विंटल घोषित किया है, पर पूर्वी उत्तरप्रदेश और बिहार के किसान 1000 से 1500 रुपये में बाजार में धान बेचने के लिए मजबूर हैं। केंद्र सरकार ने दलहन का न्यूनतम समर्थन मूल्य लगभग 5000 रुपये क्विंटल घोषित किया है पर महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के किसान दालों को बाजार में 3000-4000 रुपये क्विंटल में बेचने पर मजबूर हैं। अन्य मामलों में भी यही दयनीय दशा है।
गोविंदाचार्य ने कहा कि अगर केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर खरीदने को दंडनीय अपराध बनाने वाला कानून पारित कर देती है, तो वह केंद्र सरकार का किसानों पर महान उपकार होगा। तब सरकारी मंडी हो बाजार या किसान का खेत, पंजाब हो बिहार, धान हो या दालें, किसानों को अपनी कृषि उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने लग जायेगा। अर्थात ऐसा कानून देशभर के सभी किसानों के लिए लाभदायी होगा। केंद्र सरकार अन्नदाता किसानों के प्रति अधिक संवेदनशीलता दिखाते हुए किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारण्टी देने वाला कानून शीघ्र बनाएगी, ऐसी मुझे आशा है।
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