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रांची: तीन बेटों ने कोरोना पीड़ित मां को छोड़ा, बेटी ने अपनाया, पढ़िए प्रकाश सहाय के मार्मिक पोस्ट पर वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र नाथ तिवारी के विचार

– पढ़िए प्रकाश सहाय के मार्मिक पोस्ट पर वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र नाथ तिवारी के विचार

भारत वार्ता डेस्क : बिहार विधानसभा के पिछले चुनाव में राज्य के सर्वोच्च पद पर विराजमान एक प्रमुख राजनेता ने अपने विरोधी और पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में एक चुनावी सभा में भाषण देते हुए कहा था कि बेटे के लिए बेटी पर बेटी पैदा करते रहे. 6-7 बेटियां पैदा कर दी. इस वक्तव्य पर बिहार की राजनीति में काफी बवाल मचा था. कहा गया कि उस राजनेता को अपने भाषण में ऐसी बात कहना मर्यादा को लांघना हुआ. इसको लेकर विधानसभा में भी प्रतिपक्ष के नेता ने भाषण देने वाले नेता पर करारा हमला किया था.

बेटे की चाहत

लेकिन बिहार-झारखंड समेत देश के कई राज्यों की यह सच्चाई है कि लोगों में बेटे की इतनी चाहत होती है कि वह बेटे के इंतजार में कई बेटियों को पैदा करते हैं. पत्र-पत्रिकाओं से लेकर भाषणों में बेटियों के महत्व के बारे में बड़ी-बड़ी बातें कहीं जाती हैं मगर हकीकत में ज्यादातर लोग बेटों को बेटियों के अपेक्षा अधिक तवज्जो देते हैं. हमारे समाज के लोगों में बेटों के प्रति अत्यधिक मोह का ही परिणाम है कि कानून बनाए जाने के बाद भी भ्रूण परीक्षण और भ्रूण हत्या को रोक पाना संभव नहीं हो पा रहा है.

बेटों द्वारा मां-बाप का तिरस्कार

हालांकि समाज में आए दिन यह देखने को भी मिल रहा है कि बूढ़े मां-बाप को बेटे तिरस्कृत कर रहे हैं और वैसे में बेटियां आगे बढ़कर मां-बाप का हाथ थाम सहारा बनती हैं. बिहार के एक प्रमुख शहर भागलपुर में एक बुजुर्ग महिला को उनके तीनों बेटों ने बुढ़ानाथ मोहल्ले में सड़क के किनारे छोड़ दिया था. कई दिनों तक वह भीख मांग कर पेट भरती रही. जब यह बात अखबारों में प्रमुखता से छपने लगी तो बेटे मां को घर ले गए. उस महिला के तीनों बेटों में से एक पत्रकार है. इसी शहर के एक नामचीन डॉक्टर के बारे में लोग कहते हैं कि वे अपनी बूढ़ी मां को मकान के पिछले हिस्से में सीढ़ी के नीचे रहने को जगह दे रखा है. झारखंड भाजपा के एक प्रमुख नेता जो कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं, उनके बारे में यह बात अक्सर कही जाती है कि वह अपने माता-पिता को बड़े ही उपेक्षित ढंग से घर के एक कोने में रखते हैं.  बेटों द्वारा बूढ़े मां-बाप को प्रताड़ित और उपेक्षित करने की कई घटनाएं आए दिन देखने- सुनने को मिल रही है मगर उसके बाद भी बेटियों की जगह बेटों के जन्म का मोह और लालन-पालन, पढ़ाने-लिखाने में बेटियों की उपेक्षा, बेटों को तरजीह देने , दोनों के परवरिश में भेदभाव साफ तौर पर समाज में देखने को मिल रहा है.

प्रकाश सहाय के पोस्ट के मायने

ऐसे में कभी झारखंड के नामचीन पत्रकार रहे और वर्तमान में रांची के योगदा सत्संग कॉलेज में प्राध्यापक प्रकाश सहाय का फेसबुक पोस्ट बहुत कुछ संदेश देने वाला है. प्रकाश सहाय ने जिस घटना का उल्लेख किया है वह वैसे लोगों के लिए सीख देने वाला है जो जन्म से लेकर बड़ा करने में बेटों को महत्व देते हैं और बेटियों की उपेक्षा करते हैं. प्रकाश सहाय अपने समय के बेधड़क और निडर पत्रकार रहे हैं. अपने पोस्ट में भी उन्होंने रांची के उन बेटों पर कड़ा प्रहार किया है जिन्होंने उस ममतामई मां के साथ क्रूर और अमानवीय व्यवहार किया है, जिन्होंने न केवल उनको जन्म दिया बल्कि उन्हें पालन व पोषण कर अच्छी जगह पर भी पहुंचाया. उन्होंने उस बेटी को सलाम किया है जिसने तीनों बेटों द्वारा उपेक्षित मां को अपने आंचल का छाव दिया है. प्रकाश सहाय यदि कुछ कहते हैं तो उनकी बात इसलिए भी ज्यादा गंभीरता और जिम्मेदारीपूर्वक सुननी चाहिए क्योंकि वे न केवल एक सजग बुद्धिजीवी हैं बल्कि एक यशस्वी पिता भी है जिनकी बेटी नैंसी सहाय झारखंड कैडर की तेजतर्रार आईएएस अधिकारी है. नैंसी के पति वरुण रंजन भी झारखंड कैडर के आईएएस अधिकारी हैं. प्रकाश जी ने अपने बच्चों की परवरिश में बेटा और बेटी का कभी भेद नहीं किया. प्रकाश सहाय ने अपने पोस्ट में समाज में बढ़ रही जिस विद्रूपता को उजागर किया है उससे यह भी संदेश जाता है कि कोरोना महामारी ने सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को भी छिन्न-भिन्न कर दिया है. आइए पढ़िए अपने पोस्ट में प्रकाश सहाय क्या लिखते हैं…….

प्रकाश सहाय का पोस्ट

तस्वीर सांकेतिक है किंतु कथा सच्ची.. तीन बेटों की कृतघ्नता..जिन्हें पूरी रांची पहचानती है..कोरोना से ठीक होने के बाद भी बूढ़ी माँ को घर आने से मना कर दिया..86 वर्षीय माँ रामप्यारी अस्पताल में  भर्ती थी …एक पुत्र अमेरिका में डॉलर कमाता है…दूसरा पत्रकारिता का नामी स्तंभ रह चुका है रांची में

” तस्वीरे कुछ ऐसी हैं
जिन्हें देख टूटे दर्पण
चटक चटक कर बिखर गए
बिन पत्थर मारे दरक उठे “

        रात भर सो न सकी थी बूढ़ी माँ…
कल आपको छुट्टी मिल जाएगी
आप स्वस्थ हो गयीं
आपने कोरोना को हरा दिया
नर्स की इन बातों से आह्लादित आँखों में नींद कैसे समाती…भय आशंका.. उम्मीद नाउम्मीद के साये में बाइस दिन अस्पताल में एकाकी गुजारना। बूढ़े तन मन के लिए आसान तो न था। घर जाने की खबर से उत्साहित हो गई।। राहत की साँसे ले रही थीं।। अपने घर जाएंगी।। दो बेटे..बहुएँ…अपना मकान। इसी शहर में एक बेटी भी है। बेटी डॉक्टर है।
             अस्पताल से घर जाने का इंतजार तब खत्म हुआ जब बेटी मास्क लगाए प्लास्टिक की कैप पहने कमरे में आई और कहा

” मेरे साथ मेरे घर चलो मां “
तुम्हारे घर ? “
” हाँ भाई लोगों ने हाथ खड़ा कर दिया है। कहते हैं कि मां को घर लाने में रिस्क है। वे तुम्हे घर लाना नहीं चाहते। “
          चुपचाप माँ बेटी के साथ उसके घर चली आईं। बेटे जिस घर में रहते हैं वह माँ के नाम है।स्वर्गीय पति ने सोचा होगा कि घर पत्नी के नाम से रहेगा तो कम से कम कोई निकाल न पाएगा। पति रांची कॉलेज़ में नामी प्रोफेसर थे … माँ को मिलने वाले उनके पेंशन से घर खर्च का एक बड़ा हिस्सा निपटता है। यह राँची की ही कथा है।।
           ।। सचमुच वरदान हैं बेटियां। शहर में बेटी न होती तो कहाँ जाती बूढ़ी माँ ?
        इसके आगे जो कहना सोचना है वह आज के मॉडर्न समाज का दायित्व है।।
    माँ सन्तुष्ट सुख आराम से हैं। अपनी बेटी के साथ। हाल हाल में ही बेटी और दामाद भी कोरोना से उबरे हैं। कमजोरी से जूझ रहे हैं।। मगर माँ की सेवा हो रही। धन्य है यह बेटी,,,,🙏🙏

( जी तो चाहता है कि ऐसे कृतघ्न कुपुत्रों का  पता नाम और तस्वीर का भी खुलासा कर दूं ..लेकिन कहीं बूढ़ी माँ और बेटी की पारिवारिक उलझने और न बढ़ जाएं ! ) कृपया अटकलबाज़ी में किसी का नाम ना लें …जानने के बावजूद …🙏🙏

Ravindra Nath Tiwari

तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय। 17 साल हिंदुस्तान अखबार के साथ पत्रकारिता के बाद अब 'भारत वार्ता' में प्रधान संपादक।

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Ravindra Nath Tiwari

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