तप कर सोना बनता है कुंदन, रेल अधिकारी दिलीप कुमार का कॉलम ‘अप्प दीपो भव’

अप्प दीपो भव


  • कवि, लेखक और मोटिवेशनल गुरु दिलीप कुमार भारतीय रेल यातायात सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं।

हमारे कर्म हमारी नियति का निर्धारण करते हैं। जो लोग संघर्ष की अग्नि की ताप को बर्दाश्त करने की हिम्मत रखते हैं, वे लोग कुंदन की तरह चमकते हैं। जो लोग अग्नि की तपिश को बर्दाश्त नहीं कर पाते, वे चूल्हा में झोंके जाने पर लकड़ी की तरह जल जाते हैं। उपादेयता और सार्थकता दोनों की है। लकड़ी जल कर ऊर्जा का उत्पादन करता है जबकि आग में जलकर सोना और चमकने लगता है तथा दुनिया में मान पाता है।
लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अग्नि में जलने के लिए तैयार रहना ही होगा। अग्नि में जलना आपके गुणों का परीक्षण है। बिना परीक्षा पास किये कोई सफल नहीं होता। जीवन की परीक्षा जितनी कठिन होती है, सफलता का महत्व उतना ही ज्यादा होता है। संसार में जो सोना जितना ज्यादा चमकता है, उसका मान उतना ही ज्यादा होता है।

कुंदन सा चमकते रहने के लिए कुछ अच्छे स्वाभाविक गुण हमें संस्कारों से मिलता है और कुछ गुण हमें खुद विकसित करते रहना होता है। अच्छे संस्कार हमें परिवार और समाज से मिलते हैं। परिवार ही वह प्रथम पाठशाला है जहां हमें अच्छे और बुरे के बीच में भेद करना सिखाया जाता है। अच्छे और बुरे के बीच भेद करना जितनी जल्दी हम सीख जाते हैं, हमारा कर्म पथ उतना ही सुगम होता चला जाता है। इस भेद को सिखाने में हमारे गुरुजनों और मित्रों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विद्यालयों में सुनाई जाने वाली नैतिक कथाएं महज कोरी कल्पना नहीं होती और न ही टाइम पास के लिए सुनाई जाती हैं। उन्हें सुनाने के पीछे एक विशेष उद्देश्य रहता है। नैतिक कथाओं का हमारे मन पर सकारात्मक असर पड़ता है। नैतिक कथाओं से हमारे मन को मजबूती मिलती है। नैतिक कथाएं हमें सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। हम जितनी ज्यादा नैतिक कथाएं सुनते रहते हैं और उन्हें सुनकर आत्मसात करते रहते हैं, हमारे विचार उतने ही अच्छे होते चले जाते हैं। इसीलिए विद्यालयों में प्रतिदिन प्रार्थना के साथ-साथ नैतिक कथाओं का वाचन भी किया जाता है। हर कहानी एक संदेश देती है। हर दिन जीवन में एक नया उजाला लाता है। हर पल जीवन में एक नई चुनौती खड़ी होती है और हर चुनौती अपने साथ कई-कई समाधान लाती है।
हमें चुनौतियों से घबराना नहीं है। चुनौतियों की प्रकृति को परख कर उसका सामना करना है। हम सब के अवचेतन मन में एक विशेष गुण होता है। जैसे ही कोई चुनौती सामने आती है, अवचेतन मन हमें कई-कई विकल्प देने लगता है। तेज आंधी आने पर या दुश्मन को देखकर यह हमें शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर बालू में छुपाने का विकल्प भी पेश करता है और पेड़ के पीछे छुप जाने का भी विकल्प पेश करता है। अवचेतन मन समस्याओं से सीधे टकराने का विकल्प भी पेश करता है। मन की ताकत को बटोर कर और अपने सभी संसाधनों को एकत्रित करके यदि हम चुनौतियों पर काबू पाने के लिए डट कर खड़े हो जाएं तो चुनौती कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उस पर विजय प्राप्त किया जा सकता है। जब हम बड़ी चुनौती को साध लेते हैं तो हमारे अंदर का विश्वास बड़ा हो जाता है। उसी तरह जैसे अन्य धातुओं के साथ मिश्रित सोना अग्नि की ताप को झेल कर पूरी तरह से शुद्ध और चमकदार बन जाता है।
व्यक्तित्व की तरह हम अपने विचारों को भी अग्नि की ताप में उष्मित करके कुंदन बना सकते हैं। इसके लिए अपने विचारों को मौखिक अथवा लिखित रूप से प्रकट करना आवश्यक है। इसके बाद अपने विचारों को वैसे लोगों के सम्मुख पेश करना है, जो उसकी समुचित आलोचना कर सकें। विद्वानों के साथ तर्क-वितर्क करके भी अपने विचारों को कुंदन जैसा चमकाया जा सकता है। लेकिन, कोई भी संवाद तर्क की कसौटी पर किया जाना चाहिए। दुर्भावना में आकर संवाद के दौरान वैचारिक भिन्नता होने पर मन में किसी प्रकार का क्लेश नहीं लाना चाहिए। हर विचार को तर्क की कसौटी पर परखने से उसमें निखार आता चला जाता है। यह कोई एक दिन किया जाने वाला कार्य नहीं है। बल्कि हमें ऐसा लगातार करते रहना चाहिए। लगातार संवाद करते रहने से मन की दुर्भावना समाप्त होती है और हमारे विचारों की चमक बढ़ती चली जाती है। इस चमक से मन और बुद्धि में समाहित अविकारी तत्वों का नाश हो जाता है।
मन में यदि सच्चा विश्वास है, अपने व्यक्तित्व और विचारों को लगातार परिष्कृत करते रहने की लालसा है तो फिर हमें अग्नि में तपने की प्रक्रिया से बार-बार गुजरने के लिए तैयार रखना होगा।

Ravindra Nath Tiwari

तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय। 17 साल हिंदुस्तान अखबार के साथ पत्रकारिता के बाद अब 'भारत वार्ता' में प्रधान संपादक।

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