
-दिलीप कुमार कवि, लेखक, मोटिवेशनल स्पीकर और भारतीय रेल सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं।
डर सबको लगता है। मुश्किल चुनौती देखकर सबके हलक सूख जाते हैं। मंच पर बोलने के लिए जब कोई पहली बार खड़ा होता है तो पैर कांपते हैं। ऐसा सिर्फ आमलोगों के साथ नहीं होता, बल्कि उनके साथ भी हुआ होता है जो बाद में चलकर महात्मा गांधी, अब्राहम लिंकन, नेल्सन मंडेला और मार्टिन लूथर किंग बनते हैं। माइक टायसन और मोहम्मद अली जैसे लोग जिन्होंने अपने मुक्कों की ताकत से कई नामी योद्धाओं को धराशायी किया, वे भी पहले डरते थे।
डर दो अक्षरों का एक छोटा सा शब्द है। बोलने में भी आसान, सुनने में भी आसान। लेकिन, जब डर लगता है तो बड़े-बड़े को हिला कर रख देता है। वस्तुतः डर हमारे जीवन का ही एक हिस्सा है और हमारे अंदर ही रहता है। बड़े-बड़े सूरमा भिन्न परिस्थितियों में डरते हैं। समंदर की अतल गहराइयों में जाकर मोती खोजने वाले कुछ लोग पहाड़ की चोटी की ऊंचाइयों से डरते हैं। वहीं, हवाओं से बात करने वाले कुछ लोगों को पानी से डर लगता है। चोर-उचक्कों और अपराधियों के मन में खौफ भरने वाले कुछ पुलिस अधिकारियों को अपनी पत्नियों से डर लगता है तो खेल के मैदान में सिकंदर बने कुछ लोग माइक देख कर डर जाते हैं। यह डर कभी-कभी हम पर इतना ज्यादा हावी हो जाता है कि जीना मुश्किल कर देता है और हम उन कामों को करने में भी घबराने लगते हैं जिसमें हमें सिद्धता प्राप्त होती है।
इसलिए हम चाहे कितने भी बहादुर हों, डर को मानना पड़ता है। डर की उपस्थिति को मानकर ही हम डर का सामना बेहतर तरीके से कर सकते हैं। मौर्यकालीन विचारक और शिक्षक कौटिल्य ने कहा है-
तावद्भयेन भेतव्यं यावद् भयमनागतम्।
आगतं तु भयं वीक्ष्य प्रहर्तव्यमशङ्कया ।।
भय से तभी तक डरें जब तक भय सामने न उपस्थित हो जाए। जब भय सामने उपस्थित हो ही जाए तो उस पर निर्भीकता से प्रहार करना चाहिए।
मनुष्य सहित प्रायः सभी जीव भयोत्पादक वस्तु या घटना की संभावना से घर पर रहते हैं। बहुत संभव है कि जिन चीजों से हमें डर लग रहा है, वैसी कोई चीज घटित ही न होवे। इस प्रकार का भय काल्पनिक भय हुआ। अनिष्ट की आशंका, वांछित परिणाम ना निकलने की आशंका, असफल होने की संभावना ऐसी बातों से हमें डर लगता है। लेकिन, जब हम प्रयास करते हैं तो पाते हैं कि जिन बातों से हम डर रहे थे वह बातें कही थी ही नहीं। सबसे ज्यादा डर तो हमें यह सोचकर लगता है कि लोग क्या कहेंगे। लेकिन, जब हम काम कर डालते हैं और अपने लक्ष्य में सफल होते हैं तो वही लोग जिन्हें लेकर हम नकारात्मक भाव मन में पैदा किए होते हैं, हमारी सफलता पर इतराते नजर आते हैं।
कुछ भय ऐसा होता है जिनसे हमें सचमुच डरना चाहिए। भूकंप, हिमस्खलन, चक्रवाती तूफान, बाढ़, सुखाड़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से तो जरूर ही भयभीत होना चाहिए। लेकिन, भयभीत होते हुए भी हमें उचित तैयारी करनी चाहिए ताकि यदि प्राकृतिक आपदा आ भी जाए तो कम से कम नुकसान हो। फिर यदि ऐसी बात से सामना हो ही जाए तो उसका डटकर मुकाबला करना चाहिए। भय से भागने से कोई समाधान नहीं निकलता। उचित कर्म ही इस प्रकार के भय को समाप्त कर सकता है।
जीवन की डोर हमारे हाथ में नहीं होती। कर्म हमारे हाथ में होता है। इसलिए हम अपना कर्म करें। कर्म करते हुए सावधानी आवश्यक है। यदि कोई काम करने में हमें भय लगता है, तो फिर उस काम को प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए। सदैव याद रहे- डर के आगे जीत है।
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