सकारात्मक सोच की शक्ति, रेल अधिकारी दिलीप कुमार का कॉलम ‘अप्प दीपो भव’

अप्प दीपो भव-25
-दिलीप कुमार (कवि, लेखक, मोटिवेशनल स्पीकर और भारतीय रेल यातायात सेवा के वरिष्ठ अधिकारी)

विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 के समय एक शब्द नाहक ही बदनाम हो गया। किसी भी मामले में पॉजिटिव होना विशेष गुण माना जाता रहा है, लेकिन कोविड-19 की जांच में जो पॉजिटिव हुआ, उस पर आफत आई। भय के माहौल में असुरक्षा की भावना और पर्याप्त सहयोग के न मिल पाने के कारण कोविड-19 पॉजिटिव लोगों को जीवन की सबसे बड़ी जंग लड़ने में परेशानी की हुई। संकटकाल में मित्रों और संबंधियों के व्यवहार ने भी कई पीड़ितों की सोच पर नकारात्मक प्रभाव डाला। वैश्विक महामारी की बेदर्दी के कारण बदनाम हुआ पॉजिटिव शब्द सदियों से मनुष्यों की विशेष ताकत रहा है। सकारात्मक सोच की शक्ति से सफलता की बड़ी-बड़ी कहानियां लिखी गई हैं। सकारात्मक सोच रख कर चींटी पहाड़ पर चढ़ जाती है। सकारात्मक सोच और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर दशरथ मांझी नामक व्यक्ति अपने दम पर पहाड़ काटकर रास्ता बना पाने में सफल होते हैं।
अपनी सोच को सकारात्मक बना कर हम भी अपनी जिंदगी को बदल सकते हैं। भविष्य हमेशा ही अनिश्चित रहता है। निर्धारित कर्म करने पर भी अंतिम सफलता प्राप्त हो ही जाएगी, यह जरूरी नहीं। लेकिन, सकारात्मक सोच रखने वाले लोग सफर को आनंदित बनाते हुए मंजिल की ओर बढ़ते हैं।

शिखर पर जीत का पताका फहराना गर्व की बात होती है। लेकिन, शिखर पर कोई भी अकस्मात पताका नहीं फहरा लेता। इसके लिए व्यापक योजना तैयार करनी होती है। अपनी प्रकृति और परिस्थितियों का निरपेक्ष मूल्यांकन करना होता है। सफर के लिए जरूरी संसाधनों का संग्रहण करना होता है। उसके बाद ही सकारात्मक सोच के साथ मंजिल की ओर कदम बढ़ाना होता है। हम जैसे-जैसे मंजिल की ओर एक-एक कदम बढ़ाते चले जाते हैं, सफलता हमारे नजदीक चली आती है। जो लोग भय के साथ सफ़र करते हैं, वह सफर का सही आनंद नहीं उठा पाते। लेकिन, सही तैयारी के साथ और हार-जीत की चिंता किए बिना संघर्षरत लोग सफ़र का भी खूब आनंद उठाते हैं और अंत में सफलता भी हासिल करते हैं।
सकारात्मक सोच में जादू है। जीत का जादू। कई बार कम सुविधाओं के बावजूद लोग जीवन में बड़ा मुकाम हासिल करते हैं । ऐसा सकारात्मक सोच के कारण होता है। प्रकृति में भौंरा एक ऐसा ही उदाहरण है। उसका शरीर भारी होता है। वैज्ञानिक नियमों के अनुसार वह उड़ नहीं सकता । सौभाग्य से भौंरा विज्ञान के नियमों को नहीं जानता। वह तो अपने को तितली और ड्रैगनफ्लाई का मित्र मानता है। उसके मन में उड़ान की चाहत होती है। उसे विश्वास होता है कि जैसे दूसरे कीट-पतंगे और तितलियां उड़ रही हैं, वैसे ही वह भी उड़ लेगा। इसी सकारात्मक सोच के सहारे वह प्रयास करता रहता है और एक दिन विज्ञान के नियमों को झूठलाते हुए उड़ पाने में सफल हो जाता है।
सफलता के सूत्र तो होते हैं, लेकिन नई राह के पथिक कुछ सूत्रों को मानते हैं और कुछ नए सूत्र बनाते हुए जीवन के पथ पर आगे बढ़ते हैं और फिर एक नया मुकाम हासिल करते हैं।

Ravindra Nath Tiwari

तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय। 17 साल हिंदुस्तान अखबार के साथ पत्रकारिता के बाद अब 'भारत वार्ता' में प्रधान संपादक।

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