सकल मनोरथ पूर्ण करते हैं अक्षय वट : नीतू कुमारी नवगीत

– लेखिका नीतू कुमारी नवगीत बिहार की प्रसिद्ध लोक गायिका हैं।

सनातन धर्म प्रकृति से जुड़ा हुआ धर्म है। वृक्षों की पूजा सनातन धर्म की एक प्रमुख विशेषता है। विशालकाय बरगद के वृक्ष को हमारे सनातन धर्म में काफी महत्व दिया गया है। इस वक्त के प्रति हमारी आस्था की जड़ें इतनी गहरी है कि हम देवतुल्य मानकर इसकी पूजा अर्चना करते हैं। इस वर्ष 10 जून को वट सावित्री पूजा है। अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए महिलाएं पूरे मनोयोग से इस दिन बरगद के वृक्ष के नीचे अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए पूजा-अर्चना करेंगी। गहरे रंग की लाल पीली नई साड़ियां पहन कर और सोलह सिंगार कर सनातन धर्म की महिलाएं अक्षय वट की पूजा करते हुए एक ही कामना करते हैं कि जिस तरह बरगद के पेड़ की आयु लंबी होती है उसी तरह उनके पति की आयु भी लंबी रहे तथा जन्म जन्मांतर तक पति का साथ बना रहे। इस व्रत के मूल में अखंड सौभाग्य की प्राप्ति एवं पति की दीर्घायु की कामना ही है। हर साल यह व्रत जेठ मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। इसी दिन शनि देव महाराज की जयंती भी मनाई जाती है।
पूजा करने तक निर्जला उपवास रखने वाली महिलाएं बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री सत्यवान की प्रेम कथा भी सुनती हैं। पतिव्रता सावित्री ने अपने तप, त्याग और बुद्धिमानी के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लेकर आई थी। इसलिए वट सावित्री व्रत को बेहद खास और जीवनदायी माना गया है। सुहागिन स्त्रियां पूरी श्रद्धा और अगाध विश्वास के साथ बरगद के वृक्ष की परिक्रमा करते हुए रक्षा सूत्र या रक्षा धागा बांधती हैं और अपने सुहाग के लिए लंबी उम्र और अच्छा स्वास्थ्य मांगती हैं।
वटवृक्ष या अक्षर की कथा वेद पुराणों में भी मिलती है। अक्षय जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि जिसका क्षय नहीं हो सकता। त्रेता हो या द्वापर, हर युग में बरगद वृक्ष की कथा और बरगद के पेड़ की महिमा का बखान है। अपनी विशालता के लिए जाने जाने वाले बरगद के वृक्ष की छाल में विष्णु जड़ में ब्रह्मा और शाखाओं में शिव विराजते हैं। जैन परंपरा के अनुसार प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने प्रयाग में अक्षय वट के नीचे ही तपस्या की थी।

बरगद को भारत सरकार ने राष्ट्रीय वृक्ष का दर्जा दे रखा है। इसकी आयु 500 से 1000 साल तक की होती है। जिस प्रकार से पीपल को विश्व का प्रतीक माना जाता है उसी प्रकार से बरगद को शिवजी का प्रतीक माना गया है और मेरा यह प्रकृति के सृजन का प्रतीक है इसलिए संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले लोग विशेष तौर पर बरगद के वृक्ष की पूजा करते हैं।
आध्यात्मिक, ऐतिहासिक एवं औषधीय दृष्टिकोण से भी बरगद का पेड़ बहुत ही महत्वपूर्ण है। भारत देश की सभ्यता, संस्कृति और धर्म से वट वृक्ष का गहरा नाता होना लाजमी है। तीर्थ दीपिका में पांच प्रकार के वृक्षों का वर्णन मिलता है जिसमें अक्षय वट को सबसे अधिक प्रतिष्ठा प्रदान की गई है-
वृंदावने वटोवंशी प्रयागेय मनोरथाः ।
गयायाम अक्षयख्यातः कल्पस्तु पुरुषोत्तमे ।।
निष्कुंभं खलु लंकायां मूलैकः पंचधावटः
स्तेषु वटमूलेषु सदा तिष्ठति माधवः ।।
अक्षय वट की महिमा को समाप्त करने के लिए मध्यकाल में अनेक प्रयास किए गए। अनेक पठान राजाओं ने इस वृक्ष को सदा के लिए समाप्त करने की अनेक असफल कोशिशें की। मुगल शासक जहांगीर ने भी ऐसा प्रयास किया लेकिन जहां भी अक्षय वट को काटा गया वही पुनः पुनः नई शाखाएं अगर यह पेड़ पुनर्जीवित हो गया।
द्वादश माधव के अनुसार बाल मुकुंद माधव इसी अक्षय वट में विराजमान हैं। यह वही स्थान है जहां माता सीता ने गंगा मां की पूजा की थी।
बरगद के पेड़ को लेकर कई पौराणिक कथाओं में एक कथा के अनुसार पृथ्वी को बचाने के लिए भगवान ब्रह्मा ने बहुत बड़ा यज्ञ किया था। इस यज्ञ में भगवान ब्रह्मा स्वयं पुरोहित, भगवान विष्णु यजमान और भगवान शिव यज्ञ के देवता बने थे। यज्ञ के अंत में तीनों देवताओं ने अपनी शक्ति के पुंज से पृथ्वी के पाप के बोझ को हल्का करने के लिए एक वृक्ष उत्पन्न किया था जिसे वटवृक्ष नाम दिया गया।
बरगद की महिमा अनंत है। आज वैश्विक आपदा की घड़ी में जब हम स्वच्छ हवा के लिए तड़प रहे हैं और प्राणों की रक्षा के लिए आसमान छूती कीमतों पर ऑक्सीजन के सिलेंडर खरीद रहे हैं तो आसानी से इस बात का एहसास कर सकते हैं कि प्रकृति ने किस तरह से अपने विशालकाय ह्रदय का परिचय देते हुए बरगद और पीपल जैसे वृक्षों से इस धरा को हरित-भरित किया। आपदा की इस घड़ी में हमें अपना मूल्यांकन करना चाहिए। प्रकृति से हमने कितना कुछ लिया है लेकिन प्रकृति की हरीतिमा को बचाने के लिए कितना कम काम किया है। हमें वे सारे कार्य करने चाहिए जिससे हमारी पृथ्वी बची रहे, पृथ्वी की हरियाली बची रहे। नई पीढ़ी को प्रकृति से जोड़ने के लिए भी पूरी शिद्दत के साथ काम किया जाना चाहिए। इसके लिए सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए रचनात्मक कार्य करना समय की जरूरत है। वट सावित्री पूजा के दिन आइए हम सब मिलजुल कर न सिर्फ बरगद के पेड़ को बचाएं बल्कि पीपल, आम, लीची, शीशम सहित सभी पेड़ पौधों की रक्षा करें। हम अपनी नदियों को बचाएं। हम अपने जंगल को बचाएं। प्रकृति बचेगी तभी हम बचेंगे। प्रकृति रहेगी तभी हम इस जीवन के संगीत का आनंद उठा सकेंगे।

Ravindra Nath Tiwari

तीन दशक से अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय। 17 साल हिंदुस्तान अखबार के साथ पत्रकारिता के बाद अब 'भारत वार्ता' में प्रधान संपादक।

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