
अजीत कुमार सिंह, आरटीआई कार्यकर्ता
आज अंतराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस है . सूचना का अधिकार भी एक मानवाधिकार है. मानव अधिकारों की रक्षा ,भ्रष्टाचार के खात्मे और पारदर्शिता लाने के लक्ष्य से बना विश्व के मजबूत कानूनों में से एक है “सूचना का अधिकार अधिनियम 2005”. लेकिन अब तक के सफर में सूचना का अधिकार कानून धारदार होने की जगह लगातार कुंद हुआ है.
इस अधिकार के रास्ते में कई बाधाएं खड़ी हैं या यूं कहें कि खड़ी की जा रही हैं. यह कहना हरगिज़ गलत नहीं होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें इस कानून के प्रति उदार नहीं है. केंद्र सूचना आयोग हो या राज्य सूचना आयोग- सबके अधिकारों को लगातार सीमित किया जा रहा है. हालात यह है कि आयोग में सुनवाई करने के लिए सदस्यों का अकाल है.राज्य आयोगों में 11 आयुक्तों के बदले आज कहीं कहीं मात्र 5 -6आयुक्त ही कार्यरत है। बिहार में तो मात्र चार सदस्य हैं वहीं झारखंड में दो . मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति के लिए अदालत को निर्देश देने पड़ते हैं. आयोग के अधिकार लगातार सीमित किए जा रहे हैं. कई मामले ऐसे हैं जिनमें सूचना आयोग में अधिकारियों को जुर्माना लगाया है मगर जुर्माना की राशि उनसे वसूली नहीं जा सकी है . ज्यादातर मामलों में सामान्य प्रशासन विभाग और जिलाधिकारियों की उदासीनता के कारण अधिकारियों पर लगाए गए जुर्माने का दंड लागू नहीं हो पाता है. आयोग के निर्देश के बाद भी लोक सूचना अधिकारी सूचना उपलब्ध कराने में आनाकानी करते हैं. सामान्य तौर पर सरकारी विभाग या तो जानकारी नहीं देते हैं या फिर आधी अधूरी जानकारी देते हैं. सूचना नहीं उपलब्ध कराने और जुर्माना की राशि नहीं जमा करने वालों को बाध्यकारी बनाने के लिए सूचना आयोग के पास प्रभावकारी उपाय नहीं है. अपील के मामलों में कई बार इतने क्वायरी किए जाते हैं कि परेशान होकर सूचना मांगने वाला घर बैठ जाता है. कई मामले ऐसे हैं जिनमें आवेदन करने के 5 साल बाद सुनवाई होती है, ऐसी स्थिति में पदाधिकारियों का दो बार स्थानांतरण अन्यत्र हो चुका होता है ऐसी स्थिति में आवेदक के लिए वर्तमान पदस्थापन का व्योरा देना मुश्किल हो जाता है, जबकि आयोग को संबंधित तत्कालीन लोक सूचना पदाधिकारी का नाम और वर्तमान पदस्थापन का व्योरा वर्तमान लोक सूचना पदाधिकारी से पूछा जाना चाहिए.
देश भर में हर साल लगभग 5 से 6 लाख सूचना अधिकार के आवेदन दिए जाते हैं. मगर एक चौथाई लोगों को भी वैसी सूचनाएं नहीं मिल पाती हैं. जो वे चाहते हैं. सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न के बारे में हर कोई वाकिफ है .बिहार में अब तक 20 से अधिक कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं. बिहार और झारखंड में सैकड़ों कार्यकर्ता मुकदमा झेल रहे हैं.
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