झारखण्ड में विश्वस्तरीय पर्यटन श्रृंखला-10
प्रियरंजन, राँची
मां अंजना की गोद में बालक हनुमान को देखने के लिए पूरी दुनिया से लोग गुमला के अंजना गांव में आते हैं. गुमला झारखंड का एक ऐसा जिला है जहां एक से बढ़कर एक ऐतिहासिक धरोहर हैं जिनका पर्यटन की दृष्टि से राज्य सरकार विकास करे तो यहां की तस्वीर बदल सकती है. झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्य के पर्यटन स्थलों को विश्वस्तरीय बनाने की घोषणा की है. जानिए क्या है गुमला में देखने लायक…….
आंजनग्राम मंदिर
गुमला जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर दूर आंजन गांव में मां अंजनी का मंदिर है. बालक हनुमान को गोद में लिए मां अंजनी की यहां दुर्लभ मूर्ति है . यह देश का पहला मंदिर है जहां स्थापित मूर्ति में बालक हनुमान अपनी मां अंजना की गोद में बैठे हुए हैं. इस गांव को हनुमान की जन्मस्थली भी माना जाता है. ऐसी मान्यता है कि इस गांव के एक गुफा में हनुमान जी का जन्म हुआ था.
नवरत्नगढ़
झारखण्ड के हंपी नाम से प्रसिद्ध यह किला नागवंशी राजा दुर्जनसाल ने दोईसा में बनवाया था। यह गुमला जिला के सिसई थाना में स्थित है। 1627 ई. में जब जहाँगीर की कैद से रिहा होकर राजा दुर्जन साल राजधानी कोकरह आया तो उसने सुरक्षा की दृष्टि से अपनी राजधानी को कोकरह से दोईसा स्थानांतरित कर दिया था। यहीं उसने पाँच मंजिल महल का निर्माण कराया था। इस्लामी स्थापत्य कला से प्रभावित यह प्रथम नागवंशी इमारत है। पूर्व में इस महल में पहली मंजिल पर नौ-नौ कक्ष थे, जिसमें अधिकांश नष्ट हो चुका है। ऊपर की दो मंजिलें ढह गईं है और अब शेष तीन मंजिलों में 27 कक्ष ही बचे हैं। पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण में इसकी लंबाई 42 मीटर है। दोईसागढ़ में कपिलनाथ ने महादेव मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर में अनेक भित्तिचित्र पाया जाता है।
हल्दीघाटी मंदिर
गुमला जिले के घाघरा प्रखण्ड में कोरांबे ग्राम स्थित है। इस स्थान पर नागवंशी राजा तथा रक्सैल राजा के बीच भीषण युद्ध हुआ था। इसे ‘झारखण्ड का हल्दीघाटी’ के उपनाम से भी जाना जाता है। कोरांबे में वासुदेव राय का एक मंदिर स्थित है। इस मंदिर की स्थापना 1463 ई. में की गई थी। इस मंदिर में स्थापित प्रतिमा काले रंग की पत्थर से बनी है। इस प्रतिमा की स्थापना नागवंशी राजा चतकर्ण द्वारा की गई थी। इस मंदिर के संचालन के लिए नागवंशी राजा ने 12 गाँव दान में दिया गया था।
महामाया मंदिर
गुमला के घाघरा प्रखण्ड के हापामुनि स्थित माँ भगवती का महामाया मंदिर का निर्माण 22वें नागवंशी राजा गजघंट ने कराया था। इस मंदिर के प्रथम पुरोहित गजघंट राय के मराठा गुरू हरिनाथ थे। इस मंदिर की स्थापना मंदिर अभिलेख के अनुसार 908 ई. में की गई थी। इस अभिलेख के अनुसार नागवंशी महाराजा शिवदास कर्ण ने 1401 ई. में महामाया मंदिर में शेषशय्या पर विराजमान विष्णु की मूर्ति की स्थापना की थी। इस समय मंदिर के पुरोहित मराठा शिवनाथ देव थे। इस क्षेत्र में काली मंदिर की स्थापना एक तांत्रिक पुजारी द्वारा की गई थी। यहाँ चैत्र पूर्णिमा के दिन मंडा पूजा एवं मंडा मेला का आयोजन किया जाता है। मंडा पूजा में भगवान शिव की पूजा की जाती है।
गढ़ सहीजाना
गुमला जिला के घाघरा प्रखण्ड में स्थित गढ़ सहीजाना नागपुरी साहित्य के विकास का प्रमुख केन्द्र रहा है। प्रमुख नागपुरी कवि द्विज हरि, महेश राम तथा गणेश राम, दृग्पाल राम देवघरिया, भूपाल राम देवघरिया का संबंध इस स्थल से है।
पालकोट का राजमहल
नागवंशी शासक यदुनाथ शाह ने राजधानी दोइसा से पालकोट स्थानान्तरित किया था। नागवंशी राजाओं ने यहाँ महल, उद्यान आदि का निर्माण करवाया था। तेरहवें वित्त आयोग की सिफारिश पर राज्य सरकार द्वारा चिन्हित किये गये गुमला जिला के पाँच पुरातात्विक विरासत में पालकोट का किला भी सम्मिलित है। अन्य स्थल है अंजनधाम, टांगीनाथ, नवरतनगढ़, तथा कैथोलिक मिशन चर्च, गोविंदपुर।
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