
नई दिल्ली, भारत वार्ता संवाददाता : केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शनिवार को बिहार का दौरा करेंगे। इस दौरान वह स्वतंत्रता सेनानी सह किसान नेता सहजानंद सरस्वती की जयंती पर आयोजित किसान-मजदूर समागम को संबोधित करेंगे।
शाह की बिहार यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब पिछले दिनों राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव के महागठबंधन में बढ़ते कद से नाराज उपेंद्र उपेंद्र कुशवाहा ने जनता दल यूनाइटेड (जदयू) से इस्तीफा दे दिया और ‘राष्ट्रीय लोकतांत्रिक जनता दल’ नामक नए दल के गठन की घोषणा की।
अमित शाह ने एक ट्वीट में कहा, 25 फरवरी को बिहार के पटना में स्वामी सहजानंद सरस्वती की जयंती पर आयोजित किसान-मजदूर समागम में रहने का सौभाग्य मिलेगा। स्वामी सहजानंद सरस्वती जी के विचार और समाज सुधार के कार्य हमको सदैव प्रेरणा देते रहेंगे।
केंद्रीय गृह मंत्री ने इससे पहले किए एक अन्य ट्वीट में सहजानंद सरस्वती की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और कहा कि उनका जीवन किसानों के अधिकारों के लिए समर्पित रहा। उन्होंने कहा, विदेशी हुकूमत द्वारा किये जा रहे शोषण के खिलाफ लाखों किसानों को संगठित कर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में नई चेतना जगाई। मालूम हो कि सहजानंद सरस्वती को भारत में ‘किसान आन्दोलन’ का जनक माना जाता है। उनकी जयंती 22 फरवरी को मनाई जाती है।
भारत के प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से विभिन्न महापुरुषों को सम्मानित करने की मांग आये दिन उठती रहती है। इनमें से कुछ मांगे तो राजनीति से प्रेरित होती है, कुछ बेहद गंभीर होती है। वहीं कुछ ऐसे महापुरुषों के लिए इस सम्मान की मांग की जाती हैं जिन्हे एक नहीं कई “भारत रत्न” से सम्मानित किया जा सके और ऐसे ही महापुरुषों में शामिल हैं स्वामी सहजनान्द सरस्वती।
धर्म के क्षेत्र में सहजानंद ने वैसा ही योगदान दिया जैसा दयानन्द और विवेकानन्द का है। वहीं समाज सुधार में सहजानन्द के का अर्थपूर्ण हस्तक्षेप के लिए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उन्हें ‘दलितों का सन्यासी’ कहा है।
सहजानन्द ने किसान संगठन को तब के कांग्रेस के मुकाबले खड़ा किया था। किसान संगठन की लोकप्रियता का आंकलन इसी से किया जा सकता है कि उसकी सभाओं में कांग्रेस की सभाओं के मुकाबले की भीड़ जुटा करती थी।वर्ष 1938 में अखिल भारतीय किसान संगठन के पंजीकृत सक्रिय सदस्यों की संख्या दो लाख थी जो तत्कालीन कांग्रेस के सदस्यों के बाद दूसरी बड़ी संख्या थी। किसान संगठन के बूते ही सहजानन्द ने अपनी राजनीतिक छवि का आकार गांधी, नेहरु, बोष और तिलक के समकक्ष खडा किया था।
दिलचस्प तथ्य यह है कि उन्हें “भारत रत्न” देने कि बात अबतक बेजा है ही, आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी उन्हें भारत के इतिहास लेखन में उचित स्थान नहीं मिला है। भारतीय इतिहासकारों ने स्वतंत्रता आंदोलन की तीन बड़ी धाराओं में किसान आंदोलन की गिनती करने के बाद भी किसान आंदोलन को कायदे से कुछ-एक पन्नों में समेट दिया है। सहजानन्द के नाम पर भारत का आधुनिक इतिहास मौन है। यही वजह है कि संघर्ष के नायक रहे सहजानन्द के लिए ”भारत रत्न ” की मांग के साथ ही उन्हें इतिहास के पन्नों में भी उचित स्थान दिलवाने के लिए उनके अनुआईयों को संघर्ष करना पड़ रहा है।
क्या स्वामी सहजानन्द को ‘भारत रत्न’ देने का गृह मंत्री देंगे संदेश?
अब जब मोदी कैबिनेट के नम्बर दो माने जाने वाले केंद्रीय गृह व सहकारिता मंत्री अमित शाह पटना में आयोजित स्वामी सहजानंद सरस्वती जयंती समारोह सह किसान, मजदूर समागम में हिस्सा लेने जा रहे तब यह कहा जा रहा कि वह स्वामी सहजानंद सरस्वती की जयंती के मौके पर पटना के बापू सभागार में हो रहे किसान मजदूर समागम के बहाने भाजपा के लिए सवर्ण वोटरों और किसानों, मजदूरों को साधने जा रहे हैं। ऐसे में यह चर्चा तेज है कि क्या सवर्ण वोटरों को साधने के लिए अमित शाह सहजानन्द सरस्वती के लिए मरणोपरांत भारत रत्न देने की मांग पर कार्यक्रम के मंच से संदेश देंगे?
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