
Bharat varta desk:
सुप्रसिद्ध साहित्यकार और भारतीय प्रशासनिक सेवा से अवकाश प्राप्त अधिकारी डाक्टर भगवती शरण मिश्र का आज निधन हो गया। वे 87 साल के थे। सुबह नई दिल्ली स्थित अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। उन्होंने एक सौ से अधिक किताबों की रचना की है।बिहार में राजभाषा निदेशक, हिंदी, भोजपुरी, मैथिली ग्रंथ अकादमी के प्रमुख रहे। वे रेल मंत्रालय में भी अधिकारी रहे। वह आरा के रहने वाले थे। उनके निधन पर बिहार झारखंड के साहित्यकारों ने गहरा दुख प्रकट किया है।
अर्थशास्त्र के छात्र मगर साहित्य में अनमोल योगदान
झारखंड के नामचीन साहित्यकार डॉ राम जन्म मिश्र ने भगवतीचरण मिस्र के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा है कि उनसे उनका जुड़ाव पिछले 40 सालों से था। डॉक्टर मिश्र ने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर किया बाद में प्रशासनिक पदाधिकारी बने ।अर्थशास्त्र के विद्यार्थी होने के बाद भी साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने अनमोल योगदान दिया। वर्ष 2001 में रिटायर होने के बाद उनकी साहित्य रचना की गति काफी बढ़ गई। हिंदी ,संस्कृत ,भोजपुरी और अंग्रेजी में सामान्य रूप से डॉक्टर मिश्र की दक्षता रही है ।
डॉक्टर मिश्र के प्रसिद्धि उपन्यास– नदी मुड़ती नहीं, पहला सूरज ,पवनपुत्र , प्रथम पुरुष पुरुषोत्तम ,मैं राम बोल रहा हूं एक और अहिल्या ,देख कबीरा रोया ,गोविंद गाथा पीतांबरा, अग्नि पुरुष ,शांति दूत ,सूरज के आने तक, अरण्या , बुद्धिदाता गणेश, जनकसूता, इत्यादि ।
निबंध संग्रह –राह के पत्थर शापित लोग ,ईश्वर इत्यादि ।
कहानी संग्रह — गंगा गंगा कितना पानी ,यदा यदा ही धर्मस्य जीवनी -भारत के प्रधानमंत्री , भारत के राष्ट्रपति
बाल साहित्य-बालकों के लिए कहानी और कविताएं भी मिश्र जी ने लिखे हैं।
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