
-शिव शंकर सिंह पारिजात, उप जनसंपर्क निदेशक (अवकाश प्राप्त), सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, बिहार सरकार।
कैमूर जिला (बिहार) के भगवानपुर अंचल में पंवरा पहाड़ी पर करीब 650 फीट की ऊंचाई पर अपूर्व प्राकृतिक सुषमा के बीच एक अति महिमामयी शाक्त देवी का मंदिर है जिनकी प्रसिद्धि मुंडेश्वरी भवानी के नाम से है। भक्तों की मनोकामनाओं की सहज रूप से पूर्ण करनेवाली मुंडेश्वरी मां का स्वरूप तंत्र से जुड़े होने के बावजूद करुणामयी है, तभी तो ये रक्त-बलि नहीं लेती हैं। मुंडेश्वरी पीठ शक्ति-स्थल के साथ भगवान शिव की महिमा से भी मंडित है और मुख्य मंदिर में देवी मुंडेश्वरी के विग्रह के साथ भव्य चतुर्मुखी शिवलिंग स्थापित है।
मुंडेश्वरी मंदिर के आविर्भाव का प्रसंग ‘दुर्गा सप्तशती’ की कथा से संबंधित है जिसके अनुसार दैत्यराज महिषासुर के सेनापति चण्ड के हनन के उपरांत उसका भाई मुण्ड देवी के भयवश यहां की पहाड़ियों में आकर छिप गया जिसके मर्दन के बाद देवी का एक नाम मुंडेश्वरी पड़ गया। एक अन्य मान्यता के अनुसार इस क्षेत्र पर असुर भाई चण्ड और मुण्ड का आधिपत्य था। असुर मुण्ड ने यहाँ मुंडेश्वरी मंदिर का निर्माण करवाया, जबकि उसके अनुज भाई चुण्ड ने चैनपुर के निकट मदुराना पर्वत पर चंडेश्वरी मंदिर बनवाया।
पर्वत के उपर पाषाण खंडों से प्राचीन नागर मंदिर निर्माण शैली के उत्कृष्ट नमूने के रूप में निर्मित मुंडेश्वरी मंदिर अष्टकोणीय है जिसके चारों तरफ कलात्मक झरोखें बने हुए हैं। महिषासुर मर्दिनी के स्वरूप में काले प्रस्तर से निर्मित मुंडेश्वरी मां का विग्रह दश भुजाओं वाली है। मां की प्रतिमा के समक्ष मंदिर के मध्य स्थान पर एक आकर्षक चतुर्भुजी शिवलिंग स्थापित है। मंदिर की दिवालों पर जहां ताखें, अर्धस्तंभ, घट-पल्लव आदि के आकर्षक अलंकरण बने हुए हैं, वहीं प्रवेश द्वार पर गणेश, गंगा-यमुना, द्वारपाल आदि की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। पुराविद ब्लोच को यहां 1891-93 ई. में ब्रह्मी लिपी में मिले खंडित शिलालेख मिले थे जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस मंदिर का अस्तित्व 635 ई. से पूर्व के पहले से रहा होगा। कहते हैं कि प्राचीन काल में यह क्षेत्र शिक्षा का केंद्र रहा होगा तथा यह की पहाड़ी पर शिवस्वरूप मंडलेश्वर का मंदिर था। यहां के चतुर्मुखी शिवलिंग व गणेश की मूर्ति तथा यहां बिखरे पड़े पुरातात्विक अवशेषों पर अंकित सर्पाकृतियों के आधार पर इस स्थान को नागवंशियों से सम्बंध भी बताया जाता है जिनका काल 110 ई.पू. से 315 ई. बताया जाता है। इस क्षेत्र की पहचान महाभारत में वर्णित नागों की भूमि ‘अहिक्षेत्र’ के रूप में भी की जाती है जिसे गुरु द्रोणाचार्य को कौरव-पाण्डवों को शिक्षा देने के उपलक्ष्य में उपहार स्वरूप दिया गया था।
मुंडेश्वरी मां अत्यंत करूणामयी हैं। भक्तों की मनोरथ पूरी होने पर यहां बड़ी संख्या में लोग बलि हेतु बकरे लेकर आते हैं। पर मां रक्त की बलि नहीं लेती हैं। यहां के पुजारी माता की मूर्ति का स्पर्श कर जैसे ही बलि के बकरे पर अक्षत छींटते हैं, बकरा मूर्छित हो जाता है। किंतु पुनः पुजारी द्वारा मां की मूर्ति का स्पर्श कर उस बकरे पर अक्षत छींटते ही उठ खड़ा हो जाता है। इसी तरह यहां भगवान शिव के प्रभाव का साक्षात दर्शन होता है। कहते हैं कि यहां पर स्थापित शिवलिंग दिन के तीन प्रहरों में तीन रंग बदलता है।
मुंडेश्वरी मां की कृपा अपरम्पार है, इस कारण यहां सालों भर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। पर नवरात्र में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण आते हैं।
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