
पटना। मेवालाल चौधरी को शिक्षा मंत्री के पद से हटाने में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इतनी देरी क्यों की? इतना फजीहत क्यों झेला… उससे आगे यह भी सवाल है कि सब कुछ जानते हुए भी उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल क्यों किया गया? बतौर मंत्री नियुक्ति भी हुई तो शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग में। देश भर में इस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आलोचना हुई। उनके व्यक्तित्व पर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया था, जबकि नीतीश के व्यक्तिगत साफ छवि से पूरा देश अवगत है। फिर भी भ्रष्टाचार के इतने संगीन मामले के आरोपी को उनके द्वारा मंत्री बना दिया जाना लोगों के लिए आश्चर्य की बात थी। मंत्री बनाए जाने के पहले क्या मेवालाल के संबंध में विजिलेंस क्लीयरेंस लिया गया था? इसका मतलब मुख्यमंत्री का खुफिया तंत्र कमजोर साबित हुआ या जानबूझकर उन्हें मंत्री बनाया गया था। एक चर्चा यह भी है कि मुख्यमंत्री के किसी बहुत ही नजदीकी नेता के सलाह पर मेवालाल को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था और विवाद बढ़ने पर भी उन्हीं के दबाव में मंत्री पद से हटाने की कार्रवाई में देर हुई।
कल मुख्यमंत्री ने बुलाया और आज पदभार ग्रहण
कल देर शाम जब मुख्यमंत्री ने मेवालाल को बुलाया था और उनसे बात की उसके बाद लोगों को लगा कि तत्काल शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हो जाएगा मगर आज जब उन्होंने कार्यभार संभाल लिया तो लोगों को और हैरत हुई। यही नहीं पदभार ग्रहण करने के बाद मेवालाल के तेवर बड़े कड़े थे। उन्होंने राजद नेता तेजस्वी यादव व विरोध करने वाले अन्य लोगों के खिलाफ 50 करोड़ का मानहानि का लीगल नोटिस भेजेने की बात कहा। उन्होंने कहा कि उनके ऊपर लगाए गए सारे आरोप गलत है। चोरी और सीनाजोरी वाली कहावत से लोग हैरत में पड़ गए। लेकिन पदभार करने के कुछ ही देर बाद मुख्यमंत्री ने उन्हें अपने पास बुलाया और इस्तीफा करवा दिया। कुछ लोग का कहना है कि भाजपा के दबाव में मुख्यमंत्री को उन्हें हटाने का फैसला लेना पड़ा। लेकिन सूत्र बता कि मुख्यमंत्री ने जब देखा कि मामला तूल पकड़ रहा है और पूरे देश में इस मुद्दे पर उनकी फजीहत हो रही है तो उन्होंने मेवालाल को अविलंब पद से हटाने का निर्णय लिया। यह बता दें कि पूर्व में भी मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते इस मामले में मेवालाल को पार्टी से निलंबित भी किया था।
मेवालाल प्रकरण: आखिर कैसे हुई चूक
मेवालाल चौधरी के मंत्रिमंडल में शामिल होने से सबसे ज्यादा फजीहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हुई। सवाल यह है कि आखिर मुख्यमंत्री ने जानबूझकर कर ऐसा निर्णय क्यों लिया? लोग भी मुख्यमंत्री के इस फैसले से हैरत में थे। सबसे बड़ी हैरत के बात यह थी कि इतनी फजीहत के बावजूद मेवालाल को मंत्रिमंडल से हटाने का निर्णय नहीं हो पा रहा था। आखिर मेवालाल प्रकरण में अपनी क्षवि को ही मूल कमाई मानने वाले मुख्यमंत्री से चूक कैसे हो गई। विवादों के बीच मेवालाल ने पदभार भी ग्रहण कर लिया। चर्चा है कि इन सब के पीछे मुख्यमंत्री के सलाहकार मंडली के एक नेता की भूमिका थी। उनके सलाह पर ही पहले मेवालाल को मंत्रिमंडल में शामिल करने का निर्णय लिया गया। बाद में भारी फजीहत के बावजूद मुख्यमंत्री के सलाहकार मंडली के सलाह या दबाव में मेवालाल को मंत्रिमंडल से हटाने के निर्णय में देर हुई। तब तक मेवालाल ने पदभार ग्रहण कर लिया। मुख्यमंत्री ने अपनी क्षवि व भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहिष्णुता के नीति को ख्याल रखते हुए आननफानन में दुबारा मेवालाल को तलब किया और इस्तीफा दिलवाया। क्योंकि यह मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका था। जानकारों के अनुसार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की निजी कमाई उनकी प्रतिष्ठा और साफ-सुथरी क्षवि ही है। वे अक्सर भाषणों में करप्शन से समझौता नहीं करने की बात कहते हैं। महात्मा गांधी के सिद्धांतों की दुहाई देते हैं। सरकारी कार्यालयों में गांधी के सिद्धांतों का संदेश भी उन्होंने लगवाया। फिर भ्रष्टाचार के इतने गम्भीर आरोप वाले मेवालाल उनके कैबिनेट में कैसे घुस गए। सियासी गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कहीं मुख्यमंत्री के किसी अपने नजदीकी ने ही तो साजिश के तहत इतनी फजीहत तो न करे दिया। वैसे हमारे सूत्र बताते हैं कि मेवालाल को हटाने का निर्णय फजीहत के बाद मुख्यमंत्री ने बिना किसी दबाव के खुद ही लिया है।
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