
पटना। वर्षों से मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने का ख्वाब संजोये थे लेकिन जब अपनों ने ही नकारा तो दिल के अरमां आंसुओं में बह गए। बिहार की राजनीति में मंगलवार को एक बड़ा उलट फेर हुआ। जिसके मुताबिक राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने राष्ट्रीय जनता दल (रालोसपा) की नेतृत्व वाली महागठबंधन से खुद को अलग कर लिया। मायावती का हाथी अब उपेन्द्र कुशवाहा के पंखे को झेलेगा। जिसकी औपचारिक घोषणा कल ही उपेन्द्र कुशवाहा ने कर दिया। यानी अंततः अपने गठबंधन से उपेन्द्र कुशवाहा स्वतः ही मुख्यमंत्री के उम्मीदवार होंगे। वर्षों से मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने का ख्वाब तो पूरा हुआ लेकिन अब वे धीरे – धीरे तन्हा दिखने लगे हैं। राष्ट्रीय जनता दल की नेतृत्व वाली महागठबंधन से बेवफाई की सुगबुगाहट के साथ ही पहले रालोसपा के प्रदेश अध्यक्ष भूदेव चौधरी ही साथ छोड़ा तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने के मुहिम में शामिल हो गए। और अब बाद में रालोसपा के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव माधव आनन्द ने भी कल अंधेरी रात में तेजस्वी से मुलाकात के बाद आज अहले सुबह रालोसपा से इस्तीफा दे कर लालेटन जलाने का संकेत दे दिया।
राजद के नेता बताते हैं कि विगत लोकसभा चुनाव में महागठबंधन में उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी के हिस्से में उनके राजनीतिक वजूद से अधिक 5 सीटें मिली थी। अपने पुराने एनडीए गठबंधन में 1 सीट से अधिक नहीं देने के सनम की बेवफाई से टूट कर बैठे उपेन्द्र कुशवाहा का हाथ तब राजद ने ही थाम था और उन्हें महागठबंधन में ससम्मान 5 सीट हिस्से में दिया गया था। लेकिन अब वही उपेन्द्र कुशवाहा मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने एवं अधिक सीटों के ख्वाब में राजद से ही बेवफाई कर बैठे।
राजद से बेवफाई की सुगबुगाहट के बाद उपेन्द्र कुशवाहा अपने पार्टी के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव माधव आनन्द के माध्यम से मीडिया में एनडीए और नीतीश कुमार की गुणगान करवा रहे थे। शायद मकसद था कि मुख्यमंत्री उम्मीदवार तो न बनें लेकिन वाल्मीकि नगर लोकसभा उपचुनाव के माध्यम से पुनः केन्द्र सरकार में जगह बनाई जा सके। विधानसभा में भी कुछ सीटें मिल जाती। लेकिन न तो भाजपा और न ही एनडीए ने उन्हें भाव दिया। क्योंकि दोनों पार्टियों के साथ उपेन्द्र कुशवाहा पूर्व में बेवफाई कर चुके हैं। जिस भाजपा ने राजनीतिक से रूप से मृतप्राय हो चुके कुशवाहा को मोदी लहर में न सिर्फ संजीवनी दी बल्कि उन्हें वर्षों बाद केंद्र में मंत्री बना सत्ता सुख दिया, उसी भाजपा के साथ भी वे बेवफाई किये थे। ऐसा माना जाता है कि कुशवाहा का बेवफाई के खेल से पुराना नाता रहा है। उनका रालोसपा के सह संस्थापक अरुण कुमार के साथ बेवफाई भी सभी ने देखा है। कल तक रालोसपा के राष्ट्रीय प्रधान महासचिव रहे माधव आनंद ने भी शायद लोकसभा चुनाव के वक्त अपने साथ हुए बेवफाई को याद कर ही ऐसे वक्त में कुशवाहा का साथ छोड़ दिया है। क्योंकि, लोकसभा चुनाव के दौरान कुशवाहा ने माधव आनन्द की दावेदारी वाली पश्चिमी चंपारण सीट कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह से उनके पुत्र के लिए सौदा कर दिया था।
माधव आनन्द ने कहा कि उपेंद्र कुशवाहा ने सिर्फ और सिर्फ उनका इस्तेमाल किया। कुशवाहा सिर्फ अपने ही बारे में सोचते है। पार्टी के नेताओं के बारे में वह कभी भी नहीं सोचते, जिस वजह से मैंने पार्टी से इस्तीफा दिया। माधव आनन्द कल तक कुशवाहा के उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में ठीक बगल में बैठे दिखे थे, जिसमें मायावती की पार्टी बसपा के साथ गटबंधन की घोषणा के साथ ही मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने का ख्वाब स्वतः ही पूरा हो गया था।
पहले रालोसपा के प्रदेश अध्यक्ष भूदेव चौधरी और अब राष्ट्रीय प्रधान महासचिव माधव आनन्द के साथ छोड़ने से उपेन्द्र कुशवाहा तन्हा दिख रहे होंगे। तो अब कुशवाहा पर यह पंक्ति सटीक बैठती है कि दिल के अरमां आंसुओं में बह गए हम “बेवफाई” करके भी तन्हा रह गये।
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