झारखंड में पर्यटन- श्रृंखला-7 गुप्तकालीन है रजरप्पा मन्दिर

प्रियरंजन, राँची

झारखंड सरकार नई पर्यटन नीति की घोषणा करने वाली है। कुछ दिन पहले नेतरहाट दौरे के दौरान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने घोषणा की थी कि झारखंड के पर्यटन स्थलों को विश्वस्तरीय बनाया जाएगा । किस राज्य में एक से एक पर्यटक स्थल है जहां दुनिया भर से लोग आते हैं । जरूरत है वहां पर्यटक सुविधाओं के विस्तार का ताकि अधिक से अधिक लोगों का आकर्षण उन दर्शनीय स्थलों की ओर हो सके । रामगढ़ जिले के रजरप्पा में मां चिन्मस्तिका का मंदिर एक ऐसा तीर्थ स्थल है जहां पूरे भारत के लोग माथा टेकने आते हैं । आइए जाने रामगढ़ जिले के दर्शनीय स्थलों के बारे मेंमें-
माँ छिन्नमस्तिका शक्ति की दस महारूपों में छठा रूप मानी जाती है। उनका यह मंदिर राँची से लगभग 87 किलोमीटर दूर रामगढ़ जिले के रामगढ़-बोकारो मार्ग पर गोला से 14 किलोमीटर दूर रजरप्पा नामक स्थान पर स्थित है। भैरवी (भेड़ा) नदी और दामोदर नदी के संगम पर रजरप्पा में त्रिभुजाकार उच्च भूमि पर माँ छिन्नमस्तिका का अतिप्राचीन शक्तिपीठ मंदिर स्थित है। यहाँ दुर्गा पूजा के अवसर पर माँ की महानवमी पूजा सबसे पहले संथाल आदिवासियों द्वारा की जाती है। इन्हीं के द्वारा प्रथम बकरे की बलि दी जाती है। मंदिर का निर्माण कब और किसने करवाया स्पष्ट नहीं है, लेकिन मंदिर की स्थापत्य कला गुप्तकालीन मंदिरों की शैली से मिलती है। इस आधार पर समुद्रगुप्त को इसका निर्माणकर्ता माना जाता है। महाभारत काल में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। रामगढ़ के राजा विष्णु सिंह यहाँ योग ध्यान करते थे। शंकराचार्य ने भी इस मंदिर की यात्रा की थी।


गढ़बाँध किला
रामगढ़ जिले में दामोदर नदी के किनारे स्थित गढ़बाँध किला का निर्माण 1670 ई. में रामगढ़ राजवंश के छठे राजा हेमंत सिंह ने करवाया था। इस किले का निर्माण रामगढ़ राज्य की राजधानी बड़कागढ़ स्थित बादम से रामगढ़ स्थानांतरित किये जाने के समय हुई थी। यह किला अनेक सजे-धजे भवन, लकड़ी के ऊँँचे और नक्काशीदार दरवाजे, सुरंग, किले के चारों ओर बने अर्द्धचन्द्राकार कमरे आदि के लिए प्रसिद्ध था।
कैथा शिव मंदिर
भारतीय पुरातत्व विभाग ने रामगढ़ का कैथा शिव मंदिर को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया है। इसका निर्माण रामगढ़ राज परिवार के दलेर सिंह द्वारा 17वीं शताब्दी में कराया गया था। इस मंदिर का उपयोग सैनिक उद्देश्य से किया जाता था। यह मंदिर रामगढ़ से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसमें बंगाल, राजपूत और मुगल स्थापत्य कला शैली का उदाहरण मिलता है।

डॉ सुरेंद्र

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