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अमेरिकी राष्ट्रपति चयन और मंत्रिमंडल गठन कि कई प्रक्रिया आए हैं वहां दो दलीय व्यवस्था है

NEWSNLIVE DESK: आइये जानते हैं अमेरिका विश्व का सबसेे पुराने लोकतंत्र में एक है कैसे होता है मंत्रिमंडल गठन और राष्ट्रपति का चयन

  1. सबसे पुराना लोकतंत्र : भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त है तो अमेरिका विश्व का सबसे पुराना लोकतंत्र है। करीब 200 वर्ष पहले सन 1804 में यहां चुनाव की शुरुआत हुई। पहले उपराष्ट्रपति का चुनाव भी इलेक्टोरल कॉलेज ही करता था, लेकिन तब अलग-अलग मत नहीं डाले जाते थे। उस समय जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलते थे, वह राष्ट्रपति बनता था और दूसरे नंबर पर रहने वाला व्यक्ति उपराष्ट्रपति निर्वाचित होता था। यहां हर चार साल में चुनाव होते हैं।
  2. अमेरिकी संसद : भारत की तरह अमेरिकी संसद में भी दो सदन होते हैं। पहला हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव जिसे प्रतिनिधि सभा भी कहा जाता है। इसके सदस्यों की संख्या 435 है। दूसरे सदन सीनेट में 100 सदस्य होते हैं। इसके अतिरिक्त अमेरिका के 51वें राज्य कोलंबिया से तीन सदस्य आते हैं। इस तरह संसद में कुल 538 सदस्य होते हैं।
  3. द्विदलीय व्यवस्था : अमेरिकी लोकतंत्र में द्विदलीय राजनीतिक व्यवस्था है। इसलिए त्रिशंकु संसद का खतरा भी नहीं होता। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट यहां दो प्रमुख पार्टियां हैं। अन्य दलों का यहां कोई वजूद नहीं है। राष्ट्रपति बनने की आकांक्षा रखने वाले उम्मीदवार सबसे पहले एक समिति बनाते हैं, जो चंदा इकट्ठा करने और संबंधित नेता के प्रति जनता का रुख भांपने का काम करती है। कई बार यह प्रक्रिया चुनाव से दो साल पहले ही शुरू हो जाती है।
  4. योग्यता : अमेरिका में राष्ट्रपति बनने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति का जन्म अमेरिका में हुआ हो और वह 14 साल से देश में रह रहा हो। उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए। साथ ही राष्ट्रपति को अंग्रेजी भाषा आना भी आवश्यक है। राष्ट्रपति का चुनाव 538 इलेक्टर्स करते हैं। राष्ट्रपति बनने के लिए कम से कम 270 इलेक्टोरल मत हासिल करना आवश्यक होता है। अमेरिकी कानून के मुताबिक राष्ट्रपति पद के दो कार्यकाल के बाद कोई भी व्यक्ति तीसरी बार चुनाव नहीं लड़ सकता।
  5. चुनाव प्रक्रिया : दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव की प्रक्रिया भारत के मुकाबले काफी पेचीदा और लंबी होती है। अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद 2 में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया का उल्लेख है। संविधान में ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ के जरिए राष्ट्रपति के चुनाव की व्यवस्था है। हालांकि अमेरिकी संविधान निर्माताओं का एक वर्ग इस पक्ष में था कि संसद को राष्ट्रपति चुनने का अधिकार मिले, जबकि दूसरा धड़ा सीधी वोटिंग के जरिए चुनाव के हक में था। ‘इलेक्टोरल कॉलेज’ को इन दोनों धड़ों की अपेक्षाओं के बीच की एक कड़ी माना गया।
  6. पहले होता है पार्टी में चुनाव : राष्ट्रपति चुनाव के पहले राजनीतिक दल अपने स्तर पर दल का प्रतिनिधि चुनते हैं। प्राथमिक चुनाव में चुने गए पार्टी के प्रतिनिधि दूसरे दौर में राजनीतिक दल का हिस्सा बनते हैं और अपनी पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चुनाव करते हैं। यही वजह है कि कुछ राज्यों में जनता ‘प्राइमरी’ दौर में मतदान का इस्तेमाल न करके ‘कॉकस’ के जरिए पार्टी प्रतिनिधि का चुनाव करती है।
  7. क्या है कॉकस और प्राइमरी? : कॉकस में पार्टी के सदस्य जमा होते हैं। स्कूलों, घरों या फिर सार्वजनिक स्थलों पर उम्मीदवार के नाम पर चर्चा की जाती है। वहां मौजूद लोग हाथ उठाकर उम्मीदवार का चयन करते हैं। वहीं प्राइमरी में मतपत्र के जरिए मतदान होता है। हर राज्य के नियमों के हिसाब से अलग-अलग तरह से प्राइमरी होती है और कॉकस प्रक्रिया भी हर राज्य के कानून के हिसाब से अलग-अलग होती है।
  8. कहां से शुरू होती है चुनाव प्रक्रिया : राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया आयोवा और न्यू हैंपशायर से शुरू होती है। दोनों ही छोटे राज्य हैं मगर यहां की आबादी में 94 प्रतिशत लोग गोरे हैं, जबकि पूरे अमेरिका में गोरी आबादी 77 फीसदी है। यहां सबसे पहले कॉकस या प्राइमरी होता है। इन दो राज्यों में मिली जीत आगे की चुनावी मुहिम पर खासा असर डालती है। हालांकि यहां की जीत का अर्थ यह नहीं होता कि प्रत्याशी को पार्टी की उम्मीदवारी मिल ही जाएगी, लेकिन आयोवा और न्यू हैंपशायर की जीत मीडिया कवरेज दिलाने में जरूर मददगार होती है।
  9. चुनाव का दिन : अमेरिका में चुनाव के लिए दिन और महीना बिलकुल तय होता है। यहां चुनावी साल के नवंबर महीने में पड़ने वाले पहले सोमवार के बाद पड़ने वाले पहले मंगलवार को मतदान होता है। हालांकि यहां 60 दिन पहले वोट डालने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस अवधि में अमेरिका से बाहर रहने वाला व्यक्ति भी ऑनलाइन वोट डाल सकता है।
  10. इस तरह बनता है मंत्रिमंडल : अमेरिका मंत्रिमंडल बनाने की प्रक्रिया भारत से बिलकुल ही भिन्न है। यहां मंत्री बनने वाले व्यक्ति के लिए जरूरी नहीं कि वह संसद का सदस्य हो, ना ही उसके लिए राजनीतिक दल का सदस्य होना जरूरी है। यदि राष्ट्रपति को लगता है तो वह विरोधी पार्टी के सदस्य अथवा किसी विषय विशेषज्ञ को भो मंत्री बना सकता है।
डॉ सुरेंद्र

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